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Saturday, July 14, 2018

सियाह औ सुफ़ैद से कहीं अधिक है नवलेखन पुरस्कार-2017 से सम्मानित कृति सियाहत

साभार: जानकीपुल 


(आलोक रंजन की किताब ‘सियाहत ’)



आज की दुनिया, आज का समाज उतने में ही उठक-बैठक कर रहा जितनी मोहलत उसे उसका बाजार दे रहा। यह तीखा सा सच स्वीकारने के लिए आपको कोई अलग से मार्क्सवादी अथवा पूँजीवादी होने की जरुरत नहीं है बस, अपने स्वाभाविक दोहरेपन को तनिक विश्राम दे ईमानदार बन महसूस करना है। इस बाजारवाद ने एक निर्मम उतावलापन दिया है और दी है हमें बेशर्म कभी पूरी न होने वाली हवस। बाजार के चाबुक पर जितनी दौड़ हम लगाते हैं उतना ही पूंजीपति घुड़सवार को मुनाफा होता है। वह इस मुनाफे से अकादमिकी सहित सबकुछ खरीदते हुए क्वालिटी लाइफ़ के मायनों में ‘वस्तु-संग्रह की अंतहीन प्रेरणा’ ठूंस देता है और हम कब बाजार के टट्टू बन गए, यह हमें भान ही नहीं होता। इस दौड़ में है नहीं,  तो दो पल ठहरकर हवा का स्वाद लेने का सुकून। सुकून का ठहराव नहीं है तो हम जल्दी-जल्दी सबकुछ समझ लेना चाहते हैं। यह हड़बड़ी भीतर ‘सरलीकरण की प्रवृत्ति’ पैदा कर देती है। अपने-अपने ‘सरलीकरण’ से इतर जो कुछ भी दिखाई देता है उसे हम नकारना शुरू कर देते हैं और सहसा हम असहिष्णु बन तो जाते हैं, पर यह भी कहाँ स्वीकार कर पाते हैं ! सरलीकरण की छटपटाहट हमें रीटोरिकल, स्टीरियोटिपिकल बनाती है। हड़बड़ी में हममें से अधिकांश मानने लगते हैं कि इतिहास माने कहानी, राजनीति माने साजिश, दर्शन माने पागलपन, मनोविज्ञान माने पागलों का अध्ययन, साहित्य माने कविता, कहानी आदि, आदि। इसी छटपटाहट में किसी कृतिविशेष को पढ़ने में व्यक्ति-विशेष को एक ऐसी असुविधा होती है जो वह व्यक्त नहीं कर पाता और कृतिविशेष का सार फिसल जाता है। उसे समझ ही नहीं आता कि किसी कविता में इतिहासप्रसंग कहाँ से आ गया, कि किसी कहानी में मनोविज्ञान कैसे घुस गया, कि किसी यात्रावृत्तांत में राजनीति क्या कर रही है, कि किसी उपन्यास में दर्शन का क्या काम, आदि, आदि। आलोक अपनी पहली ही पुस्तक से इस स्टीरियोटिपिकल मानसिकता पर घना चोट करते हैं। किताब के पहले अध्याय में ही राजनीतिक-सामाजिक-मनोवैज्ञानिक ‘अस्मिता-विमर्श’ के दर्शन करा देते हैं और यह यकीन मानिये एक लेखक के तौर पर उनके सजग, संबद्ध, प्रतिबद्ध, संजीदा होने का पाठकीय संतोष दे जाता है। आलोक की ‘सियाहत’ एक लेखक की समूची अभिव्यक्ति है फिर वह फॉर्मेट की परवाह नहीं करता, विधा की चिंता नहीं करता, वह सबकुछ दर्ज करता चलता है ईमानदारी से। सही भी है आखिर सियाहत (यात्रा) जो शुरू हुई तो मन की सियाहत को भी तो स्याही मिले। फिर यात्रा शुरू हो जाती है, पृष्ठसंख्या पर ध्यान नहीं जाता और पुस्तक के अंत में आयी चित्रवीथि आ जाती है इस अंतर्भूत संदेश के साथ कि -यात्राएँ ख़त्म नहीं होतीं !

नवलेखन पुरस्कार-2017 में उद्बोधन 

कोई कृत्रिमता नहीं, लेखक लगातार बौद्धिक संवाद में है, यात्रा के लगभग सभी दृश्यों में वह सजग है और न अपना बिहारी भदेसपना छोड़ता है और न ही अपनी अध्यापकीय  वृत्ति। उसकी व्यक्तिगत मनोदशा का भी भान जबतब होता है, खासकर बिंब-आयोजना में, नहीं तो प्राकृतिक सौंदर्य की तुलना वह रेगिस्तान के रेत के सौंदर्य से क्यों करता। यही साफगोई, लेखक और पाठक में कोई पर्दादारी नहीं रहने देती। लेखक को लाखों-लाखों का बना देती है। इस सियाहत के पन्ने अलग-अलग रखें जाएँ तो साहित्य की कई विधाएँ अपना-अपना दावा ठोकेंगी पर मूलतः है यह यात्रावृत्तांत ही। लेखक अपने अनुभवों के एक त्रिकोण में काम कर रहा है जिसके तीन कोण हैं:  सहरसा, दिल्ली और नेरियामंगलम।  अधिकांश पृष्ठों में ये तीनों कोण अपना-अपना हिस्सा अभिव्यक्त कर ही लेते हैं। यह खूबी आलोक की कलम को प्रवाह देती है। यात्रावृत्तांत में लेखक अपने मेज के स्थिरतल पर स्थिर नहीं होता, केवल कल्पनाएँ मददगार नहीं होतीं, महज बिंबों से बानगी नहीं आती, उसे लिखने के लिए हर पल, यात्रा के प्रत्येक पल में फिर-फिर यात्रा करनी होती है; इस जरूरी बौद्धिक थकन से फिर निकलती है- सियाहत। आलोक के लिए यह यात्रा किसी जहमत की तरह नहीं है बाकि एक रूहानी खब्त है जो कभी  किसी तरह ऊपर जाया जाय के रूप में आती है तो कभी चिलचिलाती धूप में साठ किमी की साईकिल पैडलमार यात्रा पर भेजती है, कभी सुदूर संपर्कविहीन मुतुवान आदिवासियों के बीच ले जाती है तो कभी लता-प्रतान सहारे चढ़-चढ़कर माड़म (वृक्ष आवास) में रहने को उकसाती है, वट्टावड़ा के उस गाँव में बीस-पच्चीस सेकेण्ड में जीवन का अब तक का सबसे बड़ा भय महसूस कराने के बावजूद वापसी में उसी जगह पर रूककर हरिणों को देखने का साहस देती है और फिर विष्णु नागर जी द्वारा उद्धृत तथ्य लें तो एक अध्यापक ने अपने पैसे खरच यह सियाहत पूरी की है। आलोक के भीतर का यह खब्त प्रथम तो उन्हें एक उम्दा यात्री बनाता है फिर उनका अनुशीलन एक अर्थपूर्ण यात्रावृत्तांत की पृष्ठभूमि बना देता है। 

सियाहत के भीतर सतत संवादों का एक सेतु बनता है। सेतु के दोनों ओर दो नगर बसते हैं जो अपनी-अपनी हनक में बहुत ही कम संवाद करते रहे हैं; उत्तर भारत और दक्षिण भारत। एक खांटी उत्तर भारतीय ठेठ दक्षिण में जा पहुँचता है। अपनी ही रौं का अलमस्त बिहारी केरल के कच्चे सौंदर्य में जा पहुँचता है। ‘नाद तक चांप, घुघनी, गनगना, एकपैरिया आदि’ शब्द-युग्मों के साथ आलोक के कथ्य में जहाँ अल्हड बिहारीपना मौजूद है वहीं वह दक्षिण के बिंब उसकी उसी महक में पिरोना नहीं भूलते। काजू के पके फल की महक, लेमनग्रास, हरी इलायची, लौंग, काली मिर्च, केले के पत्ते, नारियल, पदीमुखम की छाल, चंदन, झरना, खड़े पहाड़ों की मोटी भाँप, चाय बागान, स्ट्राबेरी के खेत, बारिश, तीखी धूप से मन तक जलना, ठंडे जंगल, रंगीन गिलहरी, रंगीन घर, हाथी, जोंक, भालू ये सभी मिलकर सियाहत का समवेत बिंब गढ़ते हैं।  यह बिहारी सूर्यलंका में पहली बार समुद्र देखते हुए बाज न आते हुए लहरों के समानांतर दौड़ते-दौड़ते दूर निकल  आता है और रोकते पुलिस वालों से भाषा के बहाने बच आता है तो बिट्ठल परिसर में पचास रूपये देकर महामंडप पर चढ़कर प्रतिबंधित हिस्से में जाने का रोमांच ले लेता है या फिर साठ किमी की साईकिल यात्रा के बाद भालू अभ्यारण में साईकिल के प्रतिबंधित होने पर रोकते अभ्यारणकर्मी की ही स्कूटी जुगाड़ लेता है।  सियाहत में दो पृथक परंपरा में पनपे बिंबों का संवाद है, दो पृथक ऐतिहासिक धाराओं का प्रयाग है, दो सामाजिकताओं, दो संस्कृतियों, दो प्राथमिकताओं, दो सामानांतर पल रहे वर्तमानों का विंध्यांचल है, सियाहत; इसलिए ही इसका पाठ महती का है। इसके पाठ का एक वितान अनेकता में एकता को तथ्यतः रेखांकित करता है तो दूसरा एकराट की भव्य संकल्पना का यथार्थिक निर्वहन करता है।  


खानपान, संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण आयाम है। लेखक की यात्रा में जहाँ कहीं भी भोजन के प्रसंग हैं, वे विस्तार में इसी हेतु हैं। बहुधा भोजन, लेखक के जीभ पर चढ़े स्वाद के अनुरूप नहीं है पर खिलाने वालों के भाव से ही लेखक को भोजन में रूचि बढ़ जाती है। यह कितनी महत्वपूर्ण बात है कि अक्सर हम उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीयों और अन्य राज्यवासियों के स्वाद की कोई परवाह ही नहीं करते, बल्कि यह भी विनोद का ही विषय हो जाता है। लेखक ने उचित ही लिखा है- आपको दूसरों की भिन्नताओं का सम्मान करना होता है।  आदिवासियों के गाँव तेरा में भी लेखक ने अधिक भाव ही ग्रहण किया जब सुगु की माँ सबको ठीक उसी तरह परोस रही थीं जैसे तीन हजार किमी दूर लेखक की माँ सबको परोसती हैं और अंत में खुद खाती हैं। 


यहाँ जो भी रंग है- गहरा है !



आलोक जब इस वाक्य से सियाहत की शुरुआत करते हैं तो पाठक को पता चल जाता है कि यह गहरे पानी पैठे के शब्द हैं। पुस्तक के पहले ही अध्याय में वे क्रूर सोने का रूपक रचते हैं और सचेत कर देते हैं कि इस गहरे रंग वाले देश में कितना कुछ छिछला भी है। जगह-जगह झरनों वाले देश में वे पानी की सियाहत पर जिज्ञासा कर बैठते हैं और पूछ उठते हैं- क्या कोई यात्रा कभी समाप्त होती है? लिखते हैं कि- कितनी अजीब बात है, झरने भी मनुष्यों की तरह होते हैं। जो छोटा-वो अकेला।  दिवाकरन के खेतों से गुजरते हुए लेखक में मानवीय संवेदना जब खेतों के चारो तरफ बिजली प्रवाहित होते लोहे के तार देखती है तो एक तरफ मनुष्य जीवन तो दुसरी तरफ पशु जीवन के चयन का ‘धर्म-संकट’ पर लेखनी चलती है। यह अजीब-सा दुर्भाग्य है कि हम वही नहीं करते जो पास हो और जिसे आसानी से किया जा सकता है। इस वाक्य में लिपटे संदेश की ग्राह्यता से ओतप्रोत आलोक ‘ज्यू टाउन’ पहुँचते हैं और हैरान होते हैं कि ज्यू टाउन में यहूदी बचे ही कितने है -महज पाँच या शायद तीन ही। यात्रा, इतिहास और राजनीति की शुरू हो जाती है फिर और लेखक की फिलिस्तीन के प्रति संवदना के लिए संस्थान के अधिकारियों के सम्मुख दिए गए स्पष्टीकरण तक जाती है। वह चर्चा रोचक है जिसमें लेखक यहूदी वृद्धा सारा से मिलता है और बिहार से आया जानकर सारा एक क्रम में पहले, ‘अभी उनके पास काम नहीं है’ और फिर ‘मै भूखा तो नहीं हूँ ?’ के बिंदु पर लेखक से जुड़ती हैं। इस एक सरल प्रसंग से बिहार और केरल की आधुनिक आवाजाही आलोक स्पष्ट कर देते हैं। 



सरकारी छुट्टियों और रविवारों में निकाली गयी गुंजाइशों के बीच की खब्त की निशानी है-सियाहत। आलोक लिखते हैं- वैसे रविवार का दिन मूलतः कल्पना का ही दिन है। किसी महान कवि के बारे में कहा जा सकता है कि उसका सारा जीवन एक रविवार ही होता होगा। आलोक यहाँ बोर्गेस की तरह सोचते हैं जिन्हें ‘स्वर्ग एक पुस्तकालय’ प्रतीत होता है। अगला ही अध्याय एक महान कवि पर है जो इस पुस्तक के कुछ महत्वपूर्ण अध्यायों में से है- ओ. एन. वी. ! जो देखते हैं आलोक वहाँ तो इस प्रश्न से जूझते हैं कि- एक कवि की पहुँच कितनी हो सकती है! चौंकते हैं कि- बाजार कबसे कवि को स्वीकार करने लगा।  इस अध्याय के आखिर में आलोक उस तथ्य तक पहुँच भी जाते हैं जहाँ से उन्हें अपने प्रश्न का माकूल जवाब मिल जाता है। त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी की बस यात्रा करते हुए लेखक को सीट को लेकर वही झगड़ा, वही तनातनी दिखी जो उसे राप्तीसागर एक्सप्रेस के इरोड स्टेशन पर रुकने पर ट्रेन की सीट पाने को लेकर दिखी और जो उत्तर भारतीय सार्वजनिक परिवहन का भी सामान्य प्रसंग है। लेखक के स्थान से बमुश्किल पांच किमी की दूरी पर हुए दर्दनाक भूस्खलन पर लेखक की छटपटाहट दिखती है जो उसे भाषा संबंधी सीमाओं पर बेबस बनाती है पर चिंता की अपनी भाषा पढ़ने में वह नहीं चूकता। यहाँ, एक बड़े उल्लेखनीय तथ्य का जिक्र आलोक करते हैं जिसमें वह दिखाते हैं आमतौर पर किसी प्राकृतिक आपदा के होने पर महज रस्मी समझी जाने वाली राजनीतिक यात्राएँ दरअसल किस तरह मानवीय जिजीविषा को सहारा दे उनसे उबरने में मदद देती हैं बशर्ते वे संजीदा हों और समय से हों। केरल के मुख्यमंत्री की वह विजिट अचानक ही आपदास्थल में व्याप्त डर के ऊपर अपना असर बना लेती है और जनबल सामान्य हो उठता है। आगे के पृष्ठों में अपने परिवेश की खोजखबर लेते हुए आलोक धर्म के समाजीकरण की प्रकिया पर कलम चलाते हैं। उनका कहना है कि भारत में प्रचलित सभी धर्मों का भारतीयकरण हो चूका है। अलग-अलग रिचुअल्स भले हैं पर उनकी अभिव्यक्ति लगभग एक जैसी ही है। यहीं, भाषा पर स्थानीयता के प्रभाव की भी चर्चा है जब लेखक बिहारी नसीर की भाषा में अपनी भाषा की स्वभाविकताएँ छूटते देखता है और उसमें मलयाली नोशन्स पाता है। आलोक स्वीकार करते हैं कि हमारे यहाँ धर्म का जैसा समाजीकरण किया गया है वह धार्मिक असहिष्णुता जगाता है। व्यक्ति के विकास में उचित शिक्षा व माहौल की क्या भूमिका है, लेखक के इस आत्मकथ्य से स्पष्ट है: ...धीरे-धीरे यही प्राथमिक समाजीकरण पुख्ता होकर इतना गहरा हो जाता है कि अपने धर्म से इतर धर्म वाले के प्रति इंतहाई नफरत भर जाती है। शुक्र है इस कदर कट्टर बनने से पहले ही मेरे दूसरे समाजीकरण ने काम करना शुरू कर दिया। अंततः इस निष्कर्ष के साथ आलोक अध्याय समाप्त करते हैं कि- धर्म का स्वरुप बहुत हद तक उसके मानने वालों की संख्या और उनके स्थानीय चरित्र पर निर्भर करता है।


रामक्कलमेड़ की उस ऊँचीं छोटी पर आलोक 


इस कदर अपने जगह की खिड़की पर घोंसला बनाते मैना युगल को देखकर चहचहाता लेखक फिर रामक्कलमेड़ की उस ऊँचीं छोटी पर रामायण के राष्ट्रीय महत्त्व को महसूसता है। राष्ट्रीयता का ही महत्त्व समझते हुए लेखक द्वारा कश्मीर से कन्याकुमारी तक की यात्रा कराने वाली हिमसागर एक्सप्रेस की यात्रा को बेहद जरूरी कहा जाता है और फिर राप्तीसागर एक्सप्रेस से अपनी एर्णाकुलम-लखनऊ यात्रा पर उत्साह प्रकट किया जाता है। इस रेलयात्रा में कई प्रसंग आते हैं पर राष्ट्र-निर्माण प्रक्रिया के जरूरी अंग के रूप में ‘शिक्षा और सेवा प्रक्रिया में राष्ट्रगत स्थानांतरण का महत्त्व’, ‘शिक्षाव्यय के मद में सरकार का पुराना और उदासीन रवैया’, ‘खुले में शौच की समस्या के मूल में आयगत असमानता, ‘एक महिला अध्यापक की राजनीतिक अशिक्षा’, ‘महिलाओं के लिए देश भर में व्याप्त असुरक्षा’ विषय बेहद जबरदस्त ढंग से उठाये गए हैं। इस अध्याय का अंत भी तनिक मार्मिक है जब लेखक यह सोचकर ट्रेन से उतरते हैं कि ट्रेन के स्टेशन पर रुकने भर के समय में साथी अध्यापकों व बच्चों से मिल लिया जाये पर आलोक लिखते हैं - मुझे ‘लाइफ ऑफ़ पाई’ फिल्म का अंत याद आ गया जहाँ बाघ ने जंगल में जाने से पहले पाई की ओर पलटकर देखा तक नहीं ! ऐसा ही शून्य लेखक को अपनी एक हवाई यात्रा में भी महसूस होता है जब एक अजनबी सहयात्री लेखक से एक साहित्यिक किताब मांग बैठती है और बहुत दिनों बाद जब डाक से वह किताब वापस आती है तो उसमें औपचारिक संदेश भी नहीं होता। सभ्यता ने सोख ली है हमारी संवेदना। एयरपोर्ट पर लेखक को भी उस स्थिति से गुजरना पड़ता है जो अब भारत के लगभग हर रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन पर आम है। हैरान-परेशान सा कोई आपसे मदद मांगता है, वह समझाना चाहता है कि दुनिया भर की सारी मुसीबतें उसके साथ इकट्ठी हो गयीं हैं और अंततः लोग उसकी मदद कर देते हैं; ज़ाहिर है अपने संवेदनशील लेखक ने भी मदद कर दी और उचित तर्क गढ़ लिख दिए हैं। अपनी लेपाक्षी की यात्रा में लेखक को स्थापत्य के अद्भुत नमूने के अलावा जो कुछ याद रहा वह महज पचास रूपये की आस में दिनभर चरखा चलाने वाली वृद्धा, जिसके बेटे-बहु बंगलौर में रहते हैं और सिलबट्टे का वह लोढ़ा जो लेखक के सर से लगभग दुगुना बड़ा रहा होगा। 

सियाहत का अगर कोई ऐसा अध्याय है जहाँ लेखक आलोक अपनी लेखकीय प्रतिभा के शिखर पर हैं तो वह ‘उदास खड़े खँडहर’ अध्याय है। 1964 में आये चक्रवाती तूफान ने देखते-देखते ही अचानक धनुष्कोटि की बसावट को लील लिया था। यकीनन, इसे पढ़कर किसी भी संवेदनशील पाठक के रोयें खड़े हो जायेंगे। बात बिंब की हो, प्रवाह की हो, संवेदना की हो, शब्दचयन की हो, शब्दचित्रांकन की हो, सब कुछ उम्दा : 


नीले समंदर पर रुई जैसे सफ़ेद बादलों वाला आकाश। वहाँ किसी दीवार के साये में खड़े होकर या फिर टूटे हुए मंदिर में धूप से बचने के लिए बैठे हुए कुत्ते को देखकर कई बार यह ख्याल आता है कि यहाँ भी ठीक वही दुनिया रही होगी जहाँ से हम आते हैं। उतनी ही हँसी और आँसू रहे होंगे। किसी ओर से मछलियाँ पकड़ी जा रही होंगी और किसी घर से मछली पकने की महक आ रही होगी। 

पर अभी तो बस अंदाजे हैं। ....... वहाँ चहलकदमी करते हुए एक अपराधबोध लगातार मेरे साथ बना रहा कि, जाने अनजाने मै उन यादों के ऊपर से गुजर रहा हूँ जो कभी एक भरा-पूरा वर्तमान था। 


अध्याय ‘मुतुवान के बीच’ सियाहत के  रोमांच का चरम है। जब लेखक आदिवासी सुगु के गाँव तेरा पहुँचते हैं जिस गाँव से बाकी केरल का संपर्क लगभग नगण्य है। कोई भी साधारण यात्री न तो इसे एक अवसर के रूप में देखता और न ही कोई पाठक, लेखक की गतिविधियों को साधारण कह सकेगा जो उसने उस ग्राम-प्रवास में कीं। पहाड़ों के बीच झील में तैरना, लताओं-प्रतानों के सहारे माड़म पर पहुँचना और रात गुजारना, शहद शहद की खोज में निकलना, सबसे ऊँची चोटी के लिए जाना, साही के काँटें चुनना, त्वचा पर हल्की ठंडक महसूस कर जोंक हटाना, चाड़-अम्बम-बिल्ल खेल का हिस्सा होना, आदिवासी लोगों का लेखक के लिए गाना और नृत्य करना, लेखक का मैथली के दो लोकगीत सुनाना और फिर अंततः गाँव के कई लोगों का दूर नदी तक छोड़ने आना। पहाड़ की उस चोटी से जो सुन्दर अलौकिक दृश्य लेखक ने निहारा, उसने लेखक को उस शानदार शब्द-युग्म को सिरजने की प्रेरणा दी जिसका जिक्र प्रोफ़ेसर अजय तिवारी जी ने भी किया था- ‘सौंदर्य का प्रलय प्रवाह’ ! आलोक बेहिचक बताते हैं कि केरल सरकार के दावों के विपरीत इस गाँव में कोई बिजली नहीं है अलबत्ता पहली बार फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सप्प, फोन कॉल्स और इंटरनेट की अनुपलब्धता में स्वयं को काफी समय तक असुविधा महसूस हुई। हम, कितने घिर गए हैं इन सबके बीच, जिनका अभी हमारे बचपन तक नामोनिशान नहीं था। बकौल आलोक - एक जीवन जिसके हम आदी होते हैं और एक जीवन जिसके हम आदी नहीं होते हैं दोनों जब एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाएँ तो अजीब उबाऊ समय खड़ा हो जाता है। यह इसी गाँव से होकर लिखना संभव था कि- हम तीनों झरने के पानी में बिस्किट भिगोकर खाने लगे।  एक हमारी सभ्य सामाजिकता जिसमें एक अदद शुक्रिया के लिए व्यक्ति मोहताज हो जाये, एक वह सुगु का गाँव जहाँ हर एक शख्स लेखक से मिलना चाहे। इसी सामाजिकता से सुगु ने ऊपर आंवले के पेड़ से सारे आंवले नहीं तोड़े थे कि और भूखा आये तो उसे खाने को मिले। आज की नाकारी शिक्षा जिसमें व्यावहारिक सहज बुद्धि के लिए अवकाश ही शेष नहीं कि सुगु जैसे आदिवासी विद्यार्थी का वन्य कौशल उसमें अपनी साख बना सके। 


आख़िरी अध्याय ‘इतिहास का उत्तर’, इतिहास, भूगोल, समाज तीनों की यात्रा समेटे हुए है। आपाधापी वाला बंगलौर घूमते हुए होसपेट जाने की योजना बनती है। हम्पी का विजयनगरम देखने की मंशा है। विरुपाक्ष मंदिर के दर्शन के बाद सूर्योदय का दृश्य मनोहारी है किन्तु देख कौन रहा है, दृश्य तो कैमरे के फ्रेम भर सहेजे जा रहे। बहुत कम लोग थे जो किसी योगी की भाँति उस सौंदर्य को आत्मसात कर रहे थे।  बिट्ठल मंदिर के उस परिसर को देखते हुए लेखक इतिहास और वर्तमान का अंतर कुछ यों दर्ज करते हैं: इतिहास में जब वह रथ बन रहा होगा तब बनाने वालों को जरा भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि वहाँ तक सबका प्रवेश इतना सुलभ हो जायेगा कि देशी तो देशी विदेशी भी कुछ रुपल्ली का टिकट लेकर रथ को धक्का लगाने आ जाएँगे ! इस सियाहत ने लेखक को तीन जर्मन दोस्त भी दिए जहाँ भाषा संकट पर एक अनामंत्रित की तरह लेखक प्रविष्ट हुआ पर अपनी सहज व्यक्तित्व से सर्वमान्य सर्वस्वीकार्य हो गया। इस  भारत-जर्मनी मैत्री ने साथ-साथ केवल धमाल ही नहीं मचाये अपितु जाने कितने ही विषयों पर लगातार सक्रिय विमर्श भी जारी रहा। किताब की शुरुआत में जहाँ लेखक भारत के राज्यों के बीच विमर्श करते हैं वहीं इस अध्याय में वह भारतीय प्रतिनिधि बनकर जर्मन नागरिकों से विमर्श में आ जुटते हैं। अजनबी बच्चों का लेखक से तुरत ही घुलता मिलता देख उनके जर्मन दोस्त बेहद हतप्रभ होते हैं। एक प्रश्न आलोक यहाँ उन जर्मन लोगों से करते हैं जिसपर उनमें एक लम्बी चुप्पी छा गयी और दरअसल जिसका जवाब पश्चिमी संस्कृति के सापेक्ष भारतीय संस्कृति की उदात्तता में है : तुम्हारे देश में जहाँ अपराध का दर भारत के मुकाबले इतना कम है वहाँ लोग अपने ही लोगों पर विश्वास क्यों नहीं करते? जबकि हम बच्चों के प्रति बढ़ती हिंसा के बावजूद एक दूसरे पर सामान्यतया विश्वास करते हैं। हतप्रभ तो उनके जर्मन दोस्त इसबात पर भी होते हैं कि आखिर आलोक ने अभी तक उनसे हिटलर के बारे में पूछा क्यों नहीं। उचित शिक्षा और माहौल में रचा-पगा लेखक जानता है कि जर्मन लोगों से हिटलर के बारे में पूछना क्या निहितार्थ निकालता है। उनके यह पूछने पर कि आखिर भारतीय हिटलर में इतनी दिलचस्पी क्यों लेते हैं? यह संवाद अवश्य उल्लेखनीय है :


_____वह इसलिए कि वह हमारे दुश्मन का दुश्मन था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के एक नेता सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से मदद माँग चुके थे और हिटलर ने मदद का वादा भी किया था। बोस की आजाद हिन्द फौज का गठन ही जर्मनी में हुआ था। इसलिए भारतीय हिटलर को एक मददगार के रूप में देखते थे। आज भी भारत में हिटलर की आत्मकथा बहुत पढ़ी जाती है। …!

_____तो अब तो भारतीयों को समझना चाहिए न कि हिटलर ने मानवता को कितना नुकसान पहुँचाया …. ! 

_____मैडम, भारत ऐसा देश है जहाँ आजकल गाँधी को स्थापित करने की जरुरत पड़ रही है। रूढ़िवादी शक्तियाँ राजनीति और इतिहास को अलग तरह से परिभाषित कर रही हैं इसमें हिटलर और गाँधी की हत्या करने वाला नाथूराम सम्मानित किये जा रहे हैं। नाथूराम का तो बाकायदा मंदिर बनाने का प्रयास किया गया। 

_____व्हाट नॉनसेंस ! इयान उत्तेजित हो गया। 



रूढ़िवादी शक्तियाँ लगभग पुरे विश्व में फिरसे अपनी जड़ें जमा रही हैं, यह स्पष्ट हुआ जब उन्होंने अपने एक प्रदेश बवारिया का उदहारण दिया जहाँ के नागरिक कुछ भी नया स्वीकार नहीं करते। 

एक सुरुचिपूर्ण लेखक के तौर पर आलोक कुछ यकीनन बेहतरीन बिंब और रूपक गढ़ सके हैं, जिन्हें सियाहत के ज़िक्र के साथ-साथ याद किया जायेगा। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं:


हरियाली के उस गहरे अनुभव को स्पर्श करने की तमन्ना मन को इस पत्ते से उस पत्ते पर चिपका रही थी। 
नदी को मोटे-मोटे हरे कंबलों ने ढँक रखा था।
शरीर के ऊपर से पानी के लगातार गुजरने से त्वचा के ऊपर पानी धड़क रहा था। नदी की जमीन को हमेशा ऐसा ही महसूस होता होगा।
सुबह के सपनों को हल्की ठंडक झकझोरती है फिर पायताने से कब की नीचे गिर चुकी चादर याद आती है और शुरू होती है सपनों को वापस पकड़ने की दौड़। 
खेतों के टुकड़े यूँ कटे हुए थे मानों बच्चों ने खेल-खेल में ढेर सारे ब्रेड के टुकड़े करीने से बिछा दिए हों फिर उसपर हरी-हरी चटनी डाल रखी हो। खेतों में खड़े नारियल और केले के पेड़ ऊपर से ब्रेड पर बिछाई चटनी की परत जैसे लग रहे थे। 
मै वहाँ से गिरता तो यकीनन तमिलनाडु में ही लेकिन जीवित नहीं बचता। 
वे बूँदें सीधे मन पर गिर रही थीं और मन तृप्त हो रहा था। 
आकाश में सफ़ेद बादल के बड़े बड़े थक्के थे। 
मुख्य सड़क से जब हम नीचे उतरे तो टायरों के नीचे से सड़क के बजाय सड़कनुमा कोई चीज गुजर रही थी। 
आइये हमारे धान के खेतों के बीच से गुजरकर, महसूस होगा कि कहीं से आये हैं। मन महमह कर उठेगा। 
पेड़ों के नीचे चलते हुए लग रहा था कि किसी हरी सुरंग में चले जा रहे हों। 


सियाहत एक रौं में की गयी यात्राप्रसंगों पर आधारित नहीं है। इसलिए इसके लेखन में भौतिक यात्रा और मानसिक यात्रा के प्रसंग बेतरतीब पैबस्त हैं। इसमें लेकिन पाठक को सजग रहना पड़ता है कि कब लेखक दक्षिण से सहसा दिल्ली या सहरसा पहुँच जाये। अध्यायों का क्रम भी एक आयोजना में नहीं है। सभी अध्यायों को जोड़ने वाली कड़ी मौजूद नहीं है जो कम से कम एक यात्रावृत्तांत की नितांत विशेषता है। रोचकता की दृष्टि से देखें तो पुस्तक के मध्य भाग को पढ़ना पड़ता है, जबकि आख़िरी हिस्सा कब खत्म होता है पता ही नहीं चलता और शुरुआत में रोचकता अपनी गरिमा में है। एक-दो जगह टंकण त्रुटि दिखी, कहीं-कहीं वाक्य संरचना में लेखक की आंचलिकता के भी दर्शन हुए यदि उसे व्याकरणिक लिंगविधान त्रुटि न कहें तो। क्या ही अच्छा होता जो चित्र रंगीन होते और उससे भी अधिक अच्छा होता यदि विषय अनुरूप बीच-बीच में आते। 

कुल मिलाकर आलोक की यह कृति कहीं से भी उनके पहली पुस्तक होने का अंदाजा नहीं लगने देती। जिसप्रकार उन्होंने इस यात्रावृत्तांत में दर्शन, इतिहास, राजनीति, साहित्य की संगीति बिठाई है वह खासा आकर्षक है। भाषा सहज है और स्थान-स्थान के शब्दों ने उसमें अपनी जगह पायी है। आलोक ने इस यात्रावृत्तांत में कमोबेश सभी अन्य विधाओं के भी सरोकार निभाए हैं, जो उन्हें भविष्य का सम्भावनाशील साहित्यकार बनाती है।  

Saturday, July 7, 2018

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों

हकीकत: 1964 

 डॉ.श्रीश पाठक 

दो-दो भयानक महायुद्धों वाली शताब्दी अपने छठे दशक में पहुँच रही थी। शीत युद्ध की लू चल रही थी जरूर,  पर लगता था कि विश्व अब वैश्विक विनाश की ओर फिर नहीं  बढ़ेगा। दुनिया के कई देश आज़ादी की हवा का स्वाद चख रहे थे और स्वयं को इस दुविधा में पा रहे थे कि लोकतंत्र के नारे के साथ ब्रितानी विरासत ढोते अमेरिका के कैम्प में जगह बनाई जाय अथवा समाजवाद के नारे के साथ मोटाते सोवियत रूस का दामन पकड़ा जाए। ऐसे में एक तीसरे सम्मानजनक विकल्प के साथ सद्यस्वतंत्र राष्ट्र भारत सज्ज हो कह रहा था कि साथ मिलकर एक नवीन राजनीतिक-आर्थिक वैश्विक क्रम की स्थापना सम्भव है। इस विकल्प में किसी भी कैम्प में जुड़ने की बाध्यता नहीं थी, कोई प्रायोजित शत्रुता मोल लेने की आवश्यकता नहीं थी और सबसे बड़ी बात दोनों ही कैम्प के देशों के साथ सहयोग और विकास का जरिया खुला हुआ था। एक ऐसा समय जब लग रहा था कि भारत का कुशल नेतृत्व विश्व में शांति और समानता स्थापित करने में एक प्रमुख कारण बन सकता है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता दुनिया में नए स्तर को स्पर्श कर रही थी तो सहसा हिंदी के भाई चीनी ने भारत पर अकारण ही आक्रमण कर दिया।  

आज़ादी के साथ ही विभाजन का दंश झेलने के बाद फिर उसी साल पाकिस्तान से युद्ध में भारत ने जीत हासिल की थी। साठ का दशक आते-आते प्रधानमंत्री सहित समूचे राजनीतिक नेतृत्व एवं सेना का मनोबल अपने चरम पर था। विदेश नीति में एक भौगोलिक रूप से इतने बड़े पड़ोसी चीन का महत्त्व नेहरू नज़रअंदाज नहीं कर सकते थे तो उन्होंने चीन की वैश्विक पटल पर हर संभव मदद की, संयुक्त राष्ट्र के स्थाई सुरक्षा परिषद में सदस्यता तक को अनुमोदित किया । लेकिन शांतिप्रिय गाँधी के देश को युद्धप्रिय माओ के देश ने आख़िरकार धोखा दे ही दिया। देश ने आज़ादी के बाद का पहला और आख़िरी पराजय देखा। नेहरू चल बसे। बागडोर गाँधीवादी लालबहादुर शास्त्री के हाथों में आयी जो ‘जय जवान, जय किसान’ के प्रभावी नारे के साथ एक तरफ सीमा-सुरक्षा को लेकर चौकस थे वहीं देशव्यापी अनाज संकट से उन दिनों जूझ रहे थे। पराजित जर्मनी को तानाशाह हिटलर मिला तो उसने दूसरे बड़े महायुद्ध की पृष्ठभूमि लिख दी; अपने देश भारत ने अधूरी तैयारियों के साथ ही सही लोकतंत्र का हाथ थामा था और संयोग से सादगी की प्रतिमूर्ति शास्त्री जी देश की बागडोर सम्हाल रहे थे, जिन्होंने 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए दूसरे युद्ध में भारत को विजयश्री दिला ही दी। लेकिन चीन से हार के बाद देश का माहौल दैन्यभाव से भरा था। आज़ाद भारत पराजय का दाग लेकर नहीं जी सकता था। 

इसी बीच निर्देशक चेतन आनंद के नए-नवेले प्रोडक्शन हाउस हिमालया फिल्म्स ने चीनी-आक्रमण त्रासदी के एक नेपथ्य घटना को आधार बनाते हुए 1964 में जो फिल्म बनाई वह भारतीय सिने-इतिहास की पहली यथार्थपरक युद्ध फिल्म बनी: हकीकत। इस फिल्म को मानो एक अंडरटोन संदेश के लिए बनाया गया था। उस संदेश को निबाहने वाला पात्र था- एक छोटा लद्दाखी लड़का-सोनम। फिल्म के दूसरे पात्रों को निभाने वाले ढेरों कलाकारों  के असल नाम मिल जाते हैं पर इस छोटे से लड़के का पात्र किसने निभाया, उस बालकलाकार का नाम मुझे नहीं मिला। इसे क्या कहें, इससे बालकलाकारों के प्रति हमारी उदासीनता का परिचय मिलता है। सोनम, लद्दाख की खूबसूरत वादी में रहता है अपनी बहन अनग्मो और अपनी माँ के साथ। फ़ौज में शामिल होने की उसकी मंशा है सो कैप्टन बहादुर सिंह के साथ ड्रिल की ट्रेनिंग लेता है। भारतीय सेना चीनी आक्रमण में पीछे आने को मजबूर हुई थी तो उसी आलोक में निर्देशक ने कप्तान बहादुर सिंह से , सोनम को  बुजदिली के खिलाफ पाठ पढ़ाता दिखाया है। चीनी आक्रमण के साथ ही जब भारतीय चौकियाँ एक के बाद एक चीनी गिरफ्त में आने लगती हैं तो सोनम अपनी बहन अनग्मो के साथ कैप्टन बहादुर सिंह की चौकी को सेना की एक सूचना देने पहुँचता है। अपनी बहन अनग्मो और कैप्टन बहादुर सिंह सहित भारतीय जवानों की मार्मिक शहादत देखने के बाद भी फिल्म के आख़िरी दृश्य में जब वह ब्रिगेडियर सिंह को सलामी देता है तो उस सलामी में वह वही सन्देश देता है जिसकी जरुरत भारत की आम अवाम को चीनी हार के बाद थी और वो ये कि हम मर्माहत हैं पर बुजदिल नहीं है और अगली किसी नयी चुनौती के लिए पीढ़ियाँ तैयार है। 

पंजाब सरकार के सहयोग से बनाई गयी फिल्म को लिखा चेतन आनंद ने ही। फिल्म हकीकत, जवाहरलाल नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए शुरू होती है और इसका नाम हकीकत, उस वक्त भारत-चीन युद्ध के सन्दर्भ में फैले जाने कितने अपवादों के जवाब की तरह थी। लद्दाख के जैसे दृश्य चेतन ने शूट किये हैं वह भी एक युद्ध फिल्म के लिए; यह वाकई जबरदस्त बात है कि इतने लॉजिस्टिक के साथ यह सब कैसे संभव किया होगा उन्होंने उस समय और मन में ख्याल भी आता है कि काश ये दृश्य रंगीन फ्रेम में होते। लाहौर में जन्में चेतन आंनद, कांग्रेस में सक्रिय रहे फिर बीबीसी में काम किया और फिर दून विद्यालय में अध्यापकी की। सिविल की परीक्षा पास नहीं कर पाए फिर अंततः मायानगरी का दामन पकड़ लिया और पहली ही बॉल पर बाउंड्री लगा दी। अपनी पहली फिल्म नीचानगर से भारतीय सिनेजगत को गौरवान्वित कर दिया जब इस फिल्म को 1946 में फ़्रांस के प्रतिष्ठित केन्स समारोह में उत्कृष्ट फिल्म का पुरस्कार मिला। गुलाम मुल्क के एक निर्देशक के लिए यह यकीनन बड़ी बात थी। 

हकीकत फिल्म में मुख्य भूमिका में थे मशहूर बलराज साहनी, विजय आनंद, संजय खान, जयंत, सुधीर, बमुश्किल दस फिल्मों में काम कर चुके धर्मेंद्र और इस फिल्म से आगाज करने वालीं शिमला में पैदा हुईं और लन्दन में पली-बढ़ी, बेहद खूबसूरत प्रिया राजवंश। प्रिया, असल ज़िंदगी में चेतन आनंद की प्रेमिका रहीं और अपनी सारी फ़िल्में उन्होंने फिर चेतन के साथ ही कीं। फिर चेतन की पत्नी के उनसे अलग होने पर वे उनके साथ रहने भी लगीं थीं। प्रिया, फिल्म में सोनम की बहन अनग्मो बनी हैं जिससे धर्मेंद्र प्रेम करते हैं। इनका प्रेम परवान चढ़ पाता कि चीनी सीमा पर आ चढ़ते हैं।  इस त्रासदी में ‘युद्धों में प्रायः स्वाभाविक बलात्कार’ की शिकार होती है, अनग्मो लेकिन अपनी जिजीविषा से फिर उठकर कुछ चीनियों को मारकर ही मरती है। प्रिया अपनी असल ज़िंदगी में भी त्रासदी की शिकार हुईं जब चेतन आनंद के बेटों ने ही उनकी सन 2000 में हत्या कर दी। 

यह फिल्म युद्ध से अधिक युद्ध की मनोदशा पर है। कुछ बहुत शानदार बिंब निर्देशक ने रचे हैं जो दर्शक को झिंझोड़ देते हैं। कैसे बलराज साहनी के किरदार को जीवन में प्रेम नसीब नहीं होता, उसकी अंगूठी दो-दो बार ठुकरा दी जाती है। पहाड़ियों के बीच फंसे भारतीय सैनिक कैसे पहाड़ की ऊंचाइयों से होते हुए लौटते हैं और उनका कप्तान बलराज साहनी दिवाली साथ मनाने की बात करता है। एक सैनिक जब अपने जुराबें उतारता है तो पैर के धब्बे यों ही देखे नहीं जा सकते थे जैसे चीनी हार के बाद भारतीय मनोदशा असहनीय हो जाती है। एक सैनिक घर से आयी मिठाई बाँटने को जब उद्यत होता है तो उसमें से मिटटी निकलती है। साथी सैनिक उसपर हँस ही रहे होते हैं कि तबतक उसकी पत्नी के लिखे खत में कुछ ऐसा होता है कि सब लाजवाब हो जाते हैं। उसकी पत्नी ने अपनी घर की क्यारी की मिटटी के साथ सैनिक के पसंदीदा फूलों के बीज भेजे हैं ताकि वह उन्हें यहाँ बर्फीले रेगिस्तान में उगा सके। फूल उगते हैं और आगे के दृश्यों में चीनी उसे फेंकते दिखाई देते हैं। बलराज साहनी का अभिनय तो है ही भावप्रवण, इस श्वेत-श्याम फिल्म में सजीले जवान धर्मेंद्र अलग ही जंचते हैं। उनकी भूमिका बहुत चुनौतीपूर्ण तो नहीं पर क्लाइमेक्स उन्हीं के हिस्से आता है, जिसमें वो ‘कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों’ गीत के साथ विदा लेते हैं।  फिल्म का एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष था कला निर्देशन और प्रतिभाशाली एम. एस. सत्यू को इसी फिल्म ने दिलाया था फिल्मफेयर बेस्ट आर्ट डायरेक्शन अवार्ड। 

हकीकत की आत्मा उसके गीत-संगीत में बसती है। चूँकि यह फिल्म एक मनोवैज्ञानिक दबाव को लगातार अभिव्यक्त करती है तो इसके गीतों में और संगीत में वह कशिश होनी थी जिससे उस पूरे मंजर को जतलाया जा सके। कैफ़ी आजमी साहब जब अपनी कलम चलाएं और मदन मोहन उसे धुन से सजाएँ तो यह अद्भुत समां बधना ही था।  डेढ़ दशक फिल्मों में गीत लिखते बिता चुके और अपने दौर के उम्दा अज़ीम शायर कैफ़ी साहब ने जो हर्फ़ इस्तेमाल किये हैं उन्हें सुनकर रौंगटें खड़े हो जाते हैं। मदन मोहन की धुनें अपने समय से आगे की थीं। उनके संगीत में विश्व संगीत और भारतीय संगीत का मधुर संयोग मिलता है। इराक के शहर इरबिल में पैदा हुए मदन मोहन कौल का बचपन मध्य एशिया में गुजरा था। अपनी जवानी के दिन मनमोहन फौज में बिता चुके थे तो वह उनका अनुभव धुन बनकर सैनिकों के इस फिल्म हक़ीक़त के गानों में महकता भी है। मदनमोहन जी का समय संगीत में बेहद कड़े प्रतिस्पर्धा का था और उन दिनों अपने-अपने बैनर के चुने हुए संगीतकार होते थे। ऐसे में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। वीर जारा में उनकी कुछ प्रयोग में नहीं आईं धुनें उनके बेटे संजीव कोहली ने प्रयोग कीं और नयी पीढ़ी ने नए इंस्ट्रूमेंट्स में मदन मोहन का जादू महसूस किया। लता जी भी मानती हैं कि उस वक्त मदन मोहन जी की धुनों को गाने में मशक्कत करनी होती थी।
  
फिल्म का पहला गाना विजय आंनद पर फिल्माया गया है। ‘मस्ती में छेड़ के तराना कोई दिल का’, आजमी साहब के लफ्ज और मनमोहन जी की धुन में मोहम्मद रफ़ी कमाल ढा रहे हैं। रफ़ी साहब बिलकुल मस्ती में हैं। वे ‘तराना’, ‘खजाना’ लफ़्ज़ों में ‘ना’ को कुछ वैसे ही लहराकर गाते हैं जैसे दो साल पहले आयी फिल्म ‘दिल तेरा दीवाना’ के शीर्षक गीत में ‘दीवाना’ लफ्ज़ में ना को छेड़ते हैं मस्ती में। रफ़ी साहब ताजा आवारा हवा के झोंकों जैसी आवाज के मालिक थे और मदन मोहन ने उस रवानी से ही इसे उनसे गवाया भी। कैफ़ी आजमी के लिखे इस गाने की कुछ पंक्तियाँ पढ़ आप भी मुस्कुरा उठेंगे:
‘मुखड़े से जुल्फ जरा सरकाउंगा, सुलझेगा प्यार उलझ मै जाऊँगा
पाके भी हाय बहुत पछताऊंगा, ऐसा सुकून कहाँ फिर पाऊंगा।’ 

कैफ़ी साहब ने अपनी कैफ़ियत के शबाब पर हैं जब हक़ीक़त का यह गाना लिखते हैं। फिर इसमें मदन मोहन साहब ने अपने समय के शीर्ष तीन बड़े पार्श्वगायकों से एकसाथ गवाया है। रफ़ी साहब, मन्ना डे, तलत अजीज के साथ अभिनेता भूपिंदर ने भी इसमें स्वर दिया है।  

“होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा
ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा
होके मजबूर...

भूपिंदर: दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे
अश्क़ आँखों ने पिये और न बहाए होंगे
बन्द कमरे में जो खत मेरे जलाए होंगे
एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा

रफ़ी: उसने घबराके नज़र लाख बचाई होगी
दिल की लुटती हुई दुनिया नज़र आई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा
होके मजबूर...

तलत: छेड़ की बात पे अरमाँ मचल आए होंगे
ग़म दिखावे की हँसी ने न छुपाए होंगे
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे - (२)
सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा

मन्ना डे: ज़ुल्फ़ ज़िद करके किसी ने जो बनाई होगी
और भी ग़म की घटा मुखड़े पे छाई होगी
बिजली नज़रों ने कई दिन न गिराई होगी
रँग चहरे पे कई रोज़ न आया होगा
होके मजबूर…”


यों तो कैफ़ी साहब के ही लिखे तीन गानों को मदन मोहन जी ने लताजी से गवाया है और वे गाने दर्द, बिछोह, बेबसी और इंतज़ार को संजीदा तरीके से प्रकट भी करते हैं पर असल महफ़िल लूटी है रफ़ी साहब ने ही। यह फिल्म कभी न भुलाई जा सकेगी जिस गाने के लिए वो गाना है इस फिल्म का आख़िरी गीत। ‘कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों’ गीत की पृष्ठभूमि युद्धस्थल है। लाशों के ढेर दिखाई पड़ रहे। सोनम, अपने प्रिय कैप्टन बहादुर सिंह और अपनी प्यारी बहन अनग्मो की लाशें देखकर तड़पकर चिल्लाता है और फिर यह रौंगटें खड़े कर देने वाला यह गाना शुरू होता है। यह गाना 1964 से लेकर आजतक देशभक्ति के गानों में सबसे अलहदे पायदान पर है और हमेशा रहेगा। 1965 की लड़ाई में हुई फ़तह बताती है कि संदेश सफल रहा। एक-एक भारतीय जवान, दस-दस चीनी मारकर अब इस दुनिया से यह कहते हुए रुखसत हो रहे हैं:

“कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने के रुत रोज़ आती नहीं
हस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे
वह जवानी जो खूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

राह कुर्बानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले
फतह का जश्न इस जश्न‍ के बाद है
ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले

बांध लो अपने सर से कफ़न साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

खींच दो अपने खूँ से ज़मी पर लकीर
इस तरफ आने पाए न रावण कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो!”

फिल्म यकीनन एक शानदार आख्यान है उस चीनी त्रासदी के समय उत्पन्न हुई मानसिक संत्रास का। बिम्ब सीधे मस्तिष्क में पहुँच झिंझोड़ते हैं। संदेश, स्पष्ट और प्रभावकारी है। फिल्म एकदम यथार्थ महसूस कराती है क्योंकि ज्यादातर शूटिंग लद्दाख में ही हुई। कहना होगा कि कहीं न कहीं फिल्म अनावश्यक धीरे हुई है, लेकिन 1964 के हिसाब से यह स्वाभाविक लगता है। दरअसल, महज एक फिल्म की तरह इसे नहीं देखा जा सकता। यह उस वक्त की कॉमन सोशल साइकी को कैथार्सिस का मौका देती है। उस समय फ़िल्में इकलौती दृश्य मनोरंजन माध्यम हैं जो उपलब्ध हैं तो बेहद असरकारी भी हैं। इस फिल्म के कई दृश्यों को देखकर सहज ही उनका विकास बाद की भारतीय युद्ध फिल्मों के दृश्यों व घटनाक्रमों में दिखाई पड़ता है। 

कश्मीरी कशमकश: नेपथ्य कथ्य

साभार: गंभीर समाचार 


जम्मू एवं कश्मीर के मायने सबके लिए एक नहीं हैं। सबकी अपनी-अपनी नज़र है और अपनी-अपनी समझ। इन सबके अपने-अपने नारे हैं और सब अपने-अपने सवालों के साथ हैं। इतिहास में आपस में लड़ते अध्याय हैं। राजनीति विरोधाभासी माँगों के जायज़-नाजायज़ होने में उलझी है। भूगोल इन सबसे बेखबर पर्यावरण की चुनौतियों को खामोशी से सह रहा। अर्थशास्त्र उस हिसाब में है कि केंद्र ने कश्मीर और जम्मू को कितना भेजा। लोक प्रशासन दफ्तर की फाइलों में हुए विकास और जमीन पर हुए विकास का अंतर मन मसोस स्वीकार कर रहा। शिक्षा, इस राज्य में अपना कोई लक्ष्य ही नियत नहीं कर पा रही। विज्ञान महज उन्हें उपलब्ध है जिनकी पहचान कश्मीरी तो है पर आबोहवा किसी मेट्रो शहर की है। दर्शन में कश्मीरीयत है पर उसकी मकबूलियत कश्मीरी नहीं है। साहित्य और भाषा के अपने संकट हैं, लिखे जा रहे तो पढ़े नहीं जा रहे, पढ़े जा रहे तो समझे नहीं जा रहे, समझे जा रहे तो फिर बोले नहीं जा रहे, बहसें एकतरफ़ा हैं लोग लामबंद हैं। 

जो जम्मू है वह कश्मीर नहीं है। लद्दाख अपनी साख अलग ही छिपाए बैठा है। चीड़, चिनार, देवदार आपसे में बात नहीं कर रहे। झेलम, चिनाब, सिंधु, तवी एक-दूसरे के दुखों से अनजान हैं। पाकिस्तान और चीन एक-एक हिस्सा अपने पास दबाये बैठे हैं। मुंबई के लिए जो कश्मीर है वही दिल्ली के लिए नहीं है। और तो कितने शहरों के लिए कश्मीर महज एक खबर है जो चौबीस घंटे अनसुनी सी चलती रहती है। भारत के आम अवाम के लिए यह राज्य देशभक्ति और राष्ट्रवाद का लिटमस टेस्ट है। भाजपा को यहाँ धारा 370 की याद आती है तो कांग्रेस को यहाँ महज अल्पसंख्यक याद आते हैं। 

कश्मीर को लेकर कश्मीरी नेता भी ईमानदार नहीं हैं। भविष्य की कोई रुपरेखा नहीं, बस राजनीतिक लाभ की सियासत। मुस्लिम दिल्ली से नाराज हैं कि वह केवल दमन की भाषा जानती है, लेकिन कश्मीरी पंडितों के साथ हुए ज्यादतियों के बारे में उनकी युवा पीढ़ी न केवल अनभिज्ञ है बल्कि इसे लेकर उनके मन में किसी गलती का भाव भी नहीं है। मुस्लिम समाज ने कश्मीरी पंडितों से वार्ता और सामंजस्य का कोई उदाहरण भी पेश नहीं किया है और एक सर्वमान्य हल के रूप में उनके पास कोई सकारात्मक योजना भी नहीं है। कश्मीरी पंडित, दिल्ली से खफा होते हैं कि उनकी सुधि कोई नहीं लेता। सत्ता जब पक्ष में हो तो सामंजस्य की कोशिशों का सर्वाधिक महत्त्व होता है। आगे बढ़कर कश्मीरियत के लिए इनके प्रयास भी नगण्य ही हैं। प्रतिकार की राजनीति दलों को लाभ देती है लेकिन समाज को तो तोड़ती ही है। ये दोनों कौमें अपनी भावी पीढ़ियों को वही सब कुछ विरासत में देने वाली हैं जो इन्हें मिला हुआ है। इतिहास किसी के लिए भी कुछ अधिक टेसुएँ नहीं बहायेगा। कमोबेश उन्हीं जुमलों और तर्कों से भाजपा ने पीडीपी के साथ हाथ मिलाकर कश्मीर में सरकार बनाई थी जिनका हवाला देकर तीन साल बाद गठबंधन तोड़ा है। हिंसा इन तीन सालों में अधिक बढ़ी ही और शांति के तर्क से दमन के कुछ तरीकों को पूरी बेशर्मी के साथ जायज़ करार देने की कोशिशें भी हुईं। शांति के लिए कौन लड़ रहा इस समय कश्मीर में कहना मुश्किल है। क्या राजनीतिक दल, क्या मुस्लिम, क्या हिन्दू, क्या युवा, क्या बुजुर्ग, क्या सेना क्या समाज। सभी बस डटे हुए हैं अपनी-अपनी शैली में दिशाहीन।  

कश्मीर को लेकर हर एक की जवाबदेही है, कुछ ज़िम्मेदारी है। देश की स्वतंत्रता के बाद एक बड़ी चुनौती राष्ट्र-निर्माण की थी, जो अभी भी पूरी नहीं हुई है। राष्ट्र-निर्माण महज एक सरकारी मिशन नहीं है। नागरिक समाज की भी इसमें भूमिका है। अलग-अलग संस्कृतियों को राष्ट्रीयता के एक सूत्र में उनका अपना निजी स्पेस देकर ही बांधा जा सकता है, कहीं न कहीं ऐसी कोशिशें असफल हुई हैं। शिक्षा व्यवस्था ने भारत के आम-अवाम को कश्मीर के इतिहास, भूगोल और संस्कृति के बारे में कोई व्यापक समझ नहीं दी है। कश्मीरी सरकारों ने भी देश के दूसरे राज्यों से अपनी सरोकारिता कितनी निभायी है। दिल्ली, कश्मीर में महज चुनाव करवाकर लोकतंत्र की लाज बचाती रही है। पाकिस्तान और भारत के हुक्मरान अपनी-अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए जीते-जागते कश्मीर को महज एक खौलता मुद्दा बनाते रहे । राजनीतिक दल केवल सत्ता की ओर ताकते रहे। सारे कश्मीरी गुट इसमें अपना-अपना सियासी हिस्सा तलाशते रहे। देश तब तो एकजुट होकर साथ देने को उद्यत हो जाता है जब भारत-पाकिस्तान युद्ध में उतरते हैं, भले ही वह मैदान खेल का हो, लेकिन रोजमर्रा के वारदातों पर लगाम लगाने की कोशिशों पर देश का अवाम दिल्ली पर एकजुट होकर दबाव नहीं बनाता। देश का अवाम अपने केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर के स्कूलों, अस्पतालों, खेतों, बागों, घरों, महिलाओं, बच्चों, बेरोजगारों, बुजुर्गों की हिफाजत पर सवाल नहीं पूछता। अवाम, सेना की ज्यादतियों पर उसीतरह आँख फेर लेती है जिसतरह कश्मीर पत्थरबाजों पर। एक राज्य है भारत का जम्मू व कश्मीर, जिसमें जिंदा कौमें रहती हैं, जिनकी जिंदगी जहन्नुम बनती है तो यह सवाल बनकर भारत के प्रत्येक नागरिक के गले में अटकता क्यों नहीं?

जो महज अख़बार और टीवी के पक्षपातपूर्ण रपटों से इतर जम्मू और कश्मीर को जानने की मंशा हो, देश से प्यार जो समूचा हो, जो समझते हों कि देश महज राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, तिरंगा और अशोक चक्र नहीं, कि देश महज नदी, पहाड़, जंगल, सड़क, नहर नहीं, कि देश महज शहर, कारखाना, मॉल नहीं, बल्कि देश सबसे पहले उसके नागरिकों से बनता है, आप और हम ही देश को बनाते हैं तो यह समझना भी आसान नहीं कि ‘कश्मीर हमारा है’ से अधिक महत्वपूर्ण नारा ‘कश्मीरी हमारे हैं’ है और अपनों से पेश आने की एक तहजीब होती है। जैसे ही ‘जम्मू व कश्मीर’ टीवी, अख़बार से निकलकर एक जीता-जागता समुदाय महसूस होगा तो फिर तुरत ही समझ आएगा कि कश्मीर के राजनीतिक धड़े, राजनीतिक दल और भाजपा-कांग्रेस महज चुनाव की तैयारी कर रहे हैं और अपने-अपने वोटबैंक सहेजने की कोशिश में हैं। इन्हें प्यार महज सत्ता से है क्योंकि कश्मीर इनके लिए राज्य न होकर महज एक मुद्दा है, जिसे जिन्दा रखना जरूरी है भले ही कश्मीर एक जिन्दा लाश बना रहे। ये यूँ इसलिए हैं क्योंकि हम, भारत के लोग सवाल नहीं कर रहे, क्योंकि सही और गलत की पड़ताल किये बिना हम अपना वोट जाया कर रहे, क्योंकि हमें इतिहास, भूगोल और राजनीति बकवास लगते हैं, क्योंकि हमने अपनी अगली पीढ़ी का मकान और मुकाम अमेरिका और यूरोप में तलाशना शुरू कर दिया है।   

Wednesday, June 27, 2018

राजनीतिक दल से उम्मीदों की प्रश्नावली



देर-सबेर सभी राजनीतिक दल यह एहसास करा ही देते हैं कि उनका मकसद सत्ता भोगना ही है। एक समर्पित कार्यकर्त्ता को फिर दुसरे दलों के पुराने करतूतों का कच्चा-चिट्ठा रखने के अलावा और कुछ सूझता नहीं है। कई बार कार्यकर्ता व्यक्तिगत दुश्वारियाँ और दुश्मनी पाल लेते हैं और अक्सर चुनाव के बाद जब उनके राजनीतिक आका आपस में गलबहियाँ कर लेते हैं तो उस वक्त दिल में कहीं नश्तर सा लगता है और दुनिया के बड़े ज़ालिम होने का एहसास होता है। राजनीतिक दल अपनी परिभाषा में ही सत्ता के लिए संघर्षशील होते हैं, तो सत्ता के लिए संघर्ष करने में कोई बुराई नहीं है। किन्तु राजनीतिक दल, महज सत्ताप्राप्ति के ही निमित्त नहीं होते हैं। हाँ, यह अवश्य ही है कि सत्ताप्राप्ति ही उनका एकमात्र ध्येय बनकर रह गया है। 

संविधान सभा की मंशा यह नहीं थी कि नागरिक, किसी दल विशेष के होकर रह जाएँ। देश के भीतर अनगिनत मुद्दे होते हैं और वे मुद्दे अपनी बदलती प्राथमिकता और प्रासंगिकता में परिदृश्य पर उभरते हैं। किसी मुद्दे के सार्थक निस्तारण हेतु सम्यक नीति और कार्ययोजना की आवश्यकता होती है जिससे अधिकतम नागरिकों का वृहत्तम हित सधे। एक राजनीतिक दल में भाँति-भाँति के लोग मिलकर देश के सभी आवश्यक मुद्दे पर अपने दल के लिए एक एकीकृत नीति और कार्ययोजना गढ़ते हैं। नीतियों में अन्तर्निहित विरोधाभास न हो इसलिए राजनीतिक दल अपना एक वृहद् उद्देश्ययोजना तैयार करते हैं। इससे ही उस राजनीतिक दल की प्रकृति और चरित्र का निर्धारण होता है। किसी भी मुद्दे का कोई एक अंतिम निस्तारणनीति और कार्ययोजना नहीं हो सकता। इसलिए ही किसी देश में एक से अधिक राजनीतिक दलों की गुंजायश बनाई जाती है। भारत में विविधता अन्याय स्तरों पर है तो यहाँ बहुदलीय दल अनिवार्य ही हैं जिससे सभी विविधताओं को स्वर मिले और वे एक सिम्फनी में राष्ट्र के लिए कार्य कर सकें। एक नागरिक, किसी दल विशेष की वृहद् कार्ययोजना, उसकी नेतृत्व शक्ति एवं सांगठनिक क्षमता से प्रभावित होकर उसकी प्राथमिक सदस्यता लेकर अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकता है। यह उसका अधिकार है। लेकिन इससे उसके व्यक्तित्व पर कोई लेबल लगाना ठीक नहीं है। वह चाहे जब उस दल से अलग हो सकता है। वह सामान्य मतदाता बने रह सकता है अथवा वह किसी दूसरे दल की सदस्यता ले सकता है। 

प्रश्नों की एक चेकलिस्ट बनाई है मैंने, जिससे हम यह जान सकते हैं कि एक मतदाता और एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में हम तथा कोई राजनीतिक दल कितने खरे उतरते हैं। यह चेकलिस्ट अनंतिम है, पर उपयोगी है। इस बेहद आवश्यक कसौटी से हर नागरिक को जरूर गुजरना चाहिए: 


एक मतदाता के रूप में 

१. क्या अमुक राजनीतिक दल ने यदि राष्ट्रीय स्तर का है तो देश के लिए और यदि प्रांतीय स्तर पर है तो उस राज्य के लिए वृहद् उद्देश्ययोजना निर्मित की है? क्या आपने उसे कभी पढ़ा है?
२. क्या उसमें देश/प्रांत स्तर की सभी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं?
३. समस्याओं के वर्गीकरण में क्या सभी देश/प्रांत के सभी विभिन्नताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व है?
४. समस्याओं के निस्तारण नीति उपलब्ध है?
५. क्या आपने निस्तारण नीतियों की परख के लिए किसी चर्चा में परिभाग किया है?
६. निस्तारण नीतियों के कार्ययोजनाओं में क्या देश/प्रांत के सभी विभिन्नताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व है?
७. क्या राजनीतिक दल के सदस्य चुनाव के अलग समयों में आपसे मिलते हैं?
८. क्या आपने राजनीतिक दल के सदस्यों से अपनी समस्याएँ साझा की हैं? 
९. क्या आपको समस्याओं के हल की कोई योजना राजनीतिक दल के द्वारा सुझाई गयी या आश्वासन ही मिला?
 १०. क्या अमूमन यही होता है कि आपके क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दे राजनीतिक दल निर्धारित करते हैं? अथवा उस क्षेत्र विशेष के मतदाता वहाँ के मुद्दे निर्धारित करते हैं और राजनीतिक दल उसे अपना मुद्दा बनाकर संघर्ष करते हैं?
११. राजनीतिक दल के सदस्यों, नेताओं का मतदाताओं से चुनाव से इतर व्यवहार कैसा है? क्या वे सुलभ हैं?
१२. किसी राजनीतिक-सामाजिक हल की प्रक्रिया में अमुक राजनीतिक दल की कार्ययोजना समावेशी है अथवा एकांतिक है ? एकांतिक समाधान सामाजिक विखंडन को न्यौता देते हैं।  
१३. राजनीतिक दल के सदस्य स्वयं लाभ को वरीयता देते हैं या क्षेत्रहित को वरीयता देते हैं?
१४. सांविधानिक तौर-तरीकों में उस दल-विशेष की कितनी आस्था है?
१५. सार्वजनिक संपत्ति के साथ उस राजनीतिक दलों के सदस्यों का कैसा बर्ताव है?
१६. क्या आप जांचते हैं कि क्षेत्र के किसी नेता और राजनीतिक दलों के सदस्यों की आपराधिक पृष्ठभूमि कैसी है?
१७. क्या आप किसी राजनीतिक दल के वादों की सम्यक समीक्षा करते हैं?
१८. क्या आपके पास दलों का मैनिफेस्टो होता है?
१९. मैनीफेस्टो की गुणवत्ता कैसी है?क्या उसमें आपके क्षेत्र, प्रांत, राष्ट्र की समस्याओं का उचित प्रतिनिधित्व एवं सम्यक निस्तारण रीति स्पष्ट है?
२०. प्रति चुनाव मैनीफेस्टो में क्या कोई गुणात्मक परिवर्तन है?

एक दल-विशेष के सदस्य के रूप में 

१. क्या आपका राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित रीति से पंजीकृत है?
२. क्या आपके पास उस राजनीतिक दल की सदस्यता का प्रामाणिक पत्र है?
३. क्या आपका राजनीतिक दल राष्ट्र की मूलभूत अवधारणा में यकीन रखता है?
४. क्या आपका राजनीतिक दल संविधान में और सांविधानिक प्रक्रियाओं में आस्था रखता है?
५. क्या आपका राजनीतिक दल लोकतंत्र में यकीन रखता है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रायोगिक एवं दार्शनिक दोनों स्तरों पर मान्यता देता है?
६. क्या राजनीतिक दल के भीतर लोकतंत्र है?
७. क्या आपका राजनीतिक दल आपको स्पष्ट करता है कि वह क्यों सत्ता प्राप्त करना चाहता है?
८. क्या आपका राजनीतिक दल राष्ट्र/प्रांत/क्षेत्र से जुड़े मुद्दों के निर्धारण में आपकी राय को महत्ता देता है?
९. क्या आपके राजनीतिक दल में जनता के मुद्दों को पहचानने एवं उसके हल की कार्ययोजना को लेकर कोई आयोजना है और क्या आप इससे परिचित हैं?
१०. आपके राजनीतिक दल में विभिन्न मुद्दों को लेकर आवश्यक शोध की व्यवस्था है?
११. क्या आपका राजनीतिक दल समावेशी है?
१२. क्या आपका राजनीतिक दल आपके असहमतियों को स्थान देता है और तदनुरूप अपनी कार्ययोजनाओं में तब्दीलियाँ करता है?
१३. क्या आपका राजनीतिक दल अनैतिक कृत्यों की संस्तुति सत्ता प्राप्ति के लिए करता है?
१४. क्या आपके दल के सदस्यों को लेकर लोकतांत्रिक समानता बरती जाती है?
१५. क्या आपके राजनीतिक दल के निर्णय सामान्य सभा लेती है अथवा यह किसी एक व्यक्ति में निहित है?
१६. क्या आपका राजनीतिक चंदों और बहीखातों को लेकर पारदर्शी है? क्या सभी जानकारियाँ पब्लिक डोमेन में हैं?
१७. क्या आपका राजनीतिक दल राजनीतिक शुचिता के लिए लोकतांत्रिक रीति से अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ बिना किसी भेदभाव के करता है?
१८. क्या आपके राजनीतिक दल में महत्वपूर्ण पदों और निर्णयों के लिए किसी खास वर्ग, समूह, जाति, समुदाय अथवा परिवार की ओर देखना होता है?
१९. क्या आपका राजनीतिक दल अपनी नीतियों और कार्ययोजनाओं को समकालीन चुनौतियों के अनुरूप अद्यतन करता है?
२०. क्या आपके राजनीतिक दल के सभी सदस्य अपने कृत्यों के लिए जनता और आपके लिए जवाबदेह हैं? 


यह कसौटी अपने विषयों में अंतिम नहीं है। किसी राष्ट्र की प्रगति का दारोमदार उस राष्ट्र की राजनीति पर होता है। राजनीति बड़े ही महत्त्व का विषय है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक की होती है। नागरिक जितना ही मौन और उदासीन होता है, उसके राष्ट्र की राजनीति उतनी ही असह्यनीय, अश्लील और गैर-जिम्मेदार होती है। एक बार जरा मतदाता अथवा किसी राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में इन कसौटियों के समक्ष स्वयं को और अपने राजनीतिक दल को रखिये, लगभग तुरत ही स्पष्ट हो जायेगा कि हमारा प्यारा देश क्यों प्रगति के उस सोपान पर चढ़ने की बजाय राजनीतिक अवनति को प्राप्त हो रहा। जवाब इसका भी मिलेगा कि आखिर क्यों राजनीतिक दल सत्ता में आते ही जनता के नहीं उद्योगपतियों के हो जाते हैं और यह भी कि क्यों राजनीतिक दल नागरिकों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि वोटबैंक के रूप में देखते हैं। मुझे उम्मीद है कि इस प्रश्नावली से एक उत्तर और मिलेगा कि आखिर क्यों एक राजनीतिक दल सत्तासुख भोगने के बाद बिना कोई ठोस जनहित के काम किये बिना ही अगले चुनाव के सीटों का अश्लील लक्ष्य रखता है और उसे क्यों मतदाताओं से अधिक अपने चुनाव-मैनेजमेंट टीम पर यकीन होता है ?देखिये जरा, कहीं कोई हमें बस मैनेज तो नहीं कर रहा?   

Saturday, June 23, 2018

भारतीय विदेश नीति के बढ़ते आयाम



किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए विदेश नीति सर्वाधिक कठिन आयाम होती है। अनिश्चितता इसका निश्चित गुणधर्म है इसलिए इसमें सफलता और असफलता दूरगामी परिणाम तथा महत्त्व लेकर आती है। अपेक्षाकृत रूप से नरेंद्र मोदी सरकार को विश्व-राजनीति का एक कठिन समय नसीब हुआ है। पिछले दो दशकों में ऐसा नहीं था कि समस्याएं जटिल नहीं थीं लेकिन एक सर्वोच्च विश्व शक्ति के रूप में अमेरिका की स्थिति सर्वमान्य थी। रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन आदि सहित यूरोप के राष्ट्र अमेरिका की पंक्ति में ही स्वयं को अनुकूल कर विकास के पायदान पर चढ़ने के हिमायती बने रहे। संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व की दूसरे बड़े आर्थिक व सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कमोबेश अमेरिकी वित्त पर ही आधारित होते हुए कार्यरत रहे।  

स्थितियाँ एकदम से बदल नहीं गयी हैं, लेकिन पुतिन का रूस अब महत्वाकांक्षी राष्ट्र है, शी जिनपिंग का चीन ओबोर नीति से अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षा स्पष्ट रख रहा है, जापान अपनी शांतिपूर्ण विदेश नीति का मंतव्य छोड़कर सक्रिय विदेश नीति की ओर रुख कर चुका है। रूस, चीन, पाकिस्तान मिलकर एशिया में साझी रणनीति बना रहे। हिंदमहासागर और प्रशांत महासागर पर अमेरिका, रूस, चीन तीनों की बराबर नज़र है। जापान के सुझाव पर भारत को सम्मिलित करते हुए अमेरिका ने आस्ट्रलिया के साथ चतुष्क बनाने की कोशिश की और हाल ही में अपने बेहद खास पैसिफिक कमांड का नामकरण ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ कर दिया है। दक्षिण कोरिया ने अपने  कूटनीतिक करिश्मे का लोहा मनवाते हुए उत्कट उत्तर कोरिया के साथ सहयोग का नया आयाम विकसित करने में सफलता प्राप्त की और सिंगापुर में १२ जून को ‘डोनॉल्ड ट्रम्प-किम जोंग उन’ की बहुप्रतीक्षित भेंट होने की नींव तैयार की। रणनीतिक महत्त्व समझते हुए, रूस ने चीन द्वारा स्थापित दक्षिण-पूर्व क्षेत्र के प्रमुख आर्थिक सहयोग संगठन ‘शंघाई सहयोग संगठन’ का पाकिस्तान के साथ, भारत को भी  पूर्ण सदस्य बनवाने की सफल पैरवी की। 

मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति कई अवसरों पर जता चुकी है कि भारत न केवल अपनी वैश्विक भूमिका निभाने को तत्पर है अपितु अपनी एक ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का भी निर्वहन वह कर सकता है। अमेरिका के दबावों के बावजूद भारत रूस से एस-४०० मिसाइल तकनीक खरीद रहा है और  अमेरिका के द्वारा लगाए गए CAATSA प्रतिबंधों से भी अप्रभावित होकर रूस और ईरान से अपने व्यापारिक संबंध बनाये हुए है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के पूर्ण निर्माणकार्य के लिए भारतीय सहयोग अपनी सततता में है। हिंदमहासागर में जहाँ भारत अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस के सहयोग में है और आस्ट्रेलिया, जापान के साथ मालाबार अभ्यास से जुड़ा हुआ है वहीं मारीशस के पक्ष में चागोस मुद्दे पर भारत ने ब्रिटेन के हितों के विपक्ष में मत दिया। आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष मोदी के निमंत्रण को स्वीकार भारत की गणतंत्र परेड की शोभा बढ़ाते हैं वहीं मोदी म्यांमार और थाईलैंड के साथ मिलकर ‘एक्ट ईस्ट’ के नारे को अमली जामा पहनाने की कोशिश भी करते हैं। विरोधाभासों को साधते हुए मोदी हाल ही में संपन्न ‘शंघाई सहयोग संगठन’ के आयोजन में भारत को चीन के ओबोर अवधारणा के लिए चिंता व्यक्त करने वाले अकेले सदस्य देश के रूप में प्रदर्शित करते हैं तो कुछ समय पहले अमेरिका द्वारा एकतरफा जेरूशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर भारत का मत अमेरिका-इजरायल के विरुद्ध निर्धारित करते हैं। हाल ही में संपन्न हुई ट्रम्प और किम जोंग उन की उल्लेख्ननीय भेंट पर सधी प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे एक ‘सकारात्मक विकास’ कहा और ऐसी उम्मीद लगाई कि परमाणुमुक्त कोरियन क्षेत्र की मंसा के अनुरूप भारत के पड़ोस (पाकिस्तान) तक फैले संपर्कप्रसार सूत्र को भी दृष्टि में रखा जायेगा। 

चतुष्क और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की अमेरिकी जुगलबंदी के बीच यह सच है कि भारत को रूस के साथ अपनी पारम्परिक मित्रता कुछ परे रखनी पड़ी। इसका कारण यह भी रहा कि पुतिन का रूस, वह पारम्परिक रूस रहा भी नहीं। वैश्विक स्तर पर मोदी अपने सतत विदेश यात्राओं से जहाँ भारत की वैश्विक उपस्थिति बनाये रखी वहीं दक्षिण एशिया क्षेत्र में रूस-चीन-पाकिस्तान मैत्री ने भारत के लिए नयी चुनौतियाँ गढ़नी शुरू कीं। मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल सहित भारत के पड़ोसी देश कहीं न कहीं चीन के ओबोर आर्थिक फंदे में फंसते चले गए। इधर जब ट्रम्प के अमेरिका ने खासा स्वार्थी रुख अपना लिया और जी-७ के अपने सहयोगियों, यूरोपीय देशों और रूस, ईरान आदि के हितों से अधिक अमेरिकी हितों की स्वकेन्द्रित व्याख्या की तो रूस और चीन ने भी अपने वादों को लेकर अमूमन निश्चित रहने वाले भारत के प्रति अपना सहयोगी रुख फिर अपनाया। इशारा मिलते ही मोदी २७ अप्रैल को चीन के शहर वुहान में एक अनौपचारिक भेंट के लिए शी जिनपिंग के पास सहसा पहुँचे। चीन और भारत की इस एजेंडारहित अनौपचारिक भेंट का हासिल खासा उत्साहित करने वाला रहा। भारत और चीन, अफगानिस्तान में साझा अवसरंचनात्मक सहयोग को राजी हुए। डोकलम जैसी किसी स्थिति से बचने के लिए अपने-अपने सुरक्षा बलों को सामरिक दिशानिर्देश देने का फैसला लिया गया। पारस्परिक व्यापार संतुलन के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी। मोदी ने इस अनौपचारिक भेंट के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए जिनपिंग को भारत आने का न्यौता दिया और दोनों नेताओं ने एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था बनाने में अपनी आस्था प्रकट की। अनौपचारिक भेंट को एक नया कूटनीतिक पहल बनाते हुए पुतिन के निमंत्रण पर मोदी २१ मई को रूस के शहर सोची पहुँचे। इस भेंट को दोनों नेताओं ने ‘बेहद उर्वर’ और ‘सर्वआयामी’ करार दिया। मोदी ने जहाँ ‘शंघाई सहयोग संगठन’ की सदस्यता की पैरवी के लिए पुतिन को धन्यवाद दिया वहीं मिसाइल कण्ट्रोल रिजीम के एनएसजी और संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारतीय पक्ष की पैरोकारी के लिए आभार भी व्यक्त किया। हाल ही में चीन ने भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रयासों में अपनी भूमिका निभाने की मंशा जताई है, यह एक संतोषप्रद विकास है। 

पिछले दशकों की भाँति विश्व-व्यवस्था सरल ध्रुवीकृत नहीं है। वैश्वीकरण के आर्थिक स्वरूप ने विश्व के देशों को एक जटिल अंतर्निर्भर व्यवस्था में कार्य करने को विवश किया है जिसमें सभी राष्ट्र, अपने ‘राष्ट्र-हित’ की अधिकाधिक आपूर्ति की मंसा रखते हैं। अनिश्चित वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में कूटनीति के सभी कदम समान रूप से लाभकारी नहीं होते लेकिन यह अवश्य कहना होगा कि भारत सरकार ने जिसप्रकार विदेश नीति को अपनी वरीयता में रखा है और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया सऊदी अरब, इजरायल, अफगानिस्तान सहित रूस, उत्तर कोरिया, चीन, ईरान आदि देशों के साथ जिसप्रकार अपने हित संतुलित किये हैं, वह आसान नहीं है।


Friday, June 15, 2018

झटके में इतिहास बनाने वाली मुलाकात




दुनिया भर से आये तकरीबन ढाई हजार से अधिक पत्रकार सिंगापुर के खूबसूरत द्वीप सेंटोसा में इस दशक की बहुप्रतीक्षित भेंट ‘डोनॉल्ड ट्रम्प- किम जोंग-उन’ के साक्षी बने और इस भेंट के एक प्रमुख सूत्रधार दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जाए-इन ने अमेरिका और उत्तर कोरिया के इस ‘सेंटोसा एग्रीमेंट’ को आख़िरी बचे शीतकालीन अवशेष को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका वाला बताया। यकीनन, विश्व कूटनीति का यह एक शानदार पड़ाव था। कोरियाई द्वीप 1910 से 1945 ई. तक जापानी नियंत्रण में रहा। द्वितीय विश्व युद्ध में जब अमेरिका-ब्रिटेन-सोवियत संघ के संयुक्त नेतृत्व में हिरोशिमा-नागासाकी की भीषण विभीषिका के बाद जापान ने पराजय स्वीकार कर ली तब कोरिया की सीमाओं से लगे सोवियत संघ और प्रमुख विश्व शक्ति अमेरिका ने कोरिया को विभाजित करने का निर्णय किया। 1950 में सोवियत संचालित उत्तर कोरिया के शासक किम इल-संग और अमेरिका द्वारा संचालित दक्षिण कोरिया के शासक सिंगमन री में समूचे कोरिया को हथियाने के लिए भयानक संघर्ष छिड़ पड़ा. अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री डीन एचेसन ने एक बार कहा था कि दुनिया के सबसे बेहतरीन विशेषज्ञों से यदि सबसे भयानक युद्ध स्थल के बारे में पूछा जाए तो एक स्वर में जवाब कोरियाई प्रायद्वीप होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमन और चीन के माओ जेदांग किसी कीमत पर यह संघर्ष जीतना चाहते थे। 1953 में आख़िरकार युद्धविराम घोषित किया गया जिसमें 38वें समानांतर अक्षांश के उत्तर में नयी सीमा खींची गयी और उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया के मध्य दो मील चौड़ा एक क्षेत्र छोड़ा गया जिसे ‘असैन्य क्षेत्र (DMZ)’ कहा गया। 

जबतक सोवियत संघ अस्तित्व में रहा उत्तर कोरिया बड़ी तेजी से दक्षिण कोरिया की ही तरह प्रगति करता रहा लेकिन सोवियत संघ के विघटित होते ही उत्तर कोरिया विकास की होड़ में दक्षिण कोरिया से बहुत पिछड़ता रहा। किम इल-संग के बाद किम जोंग-इल के समय में उत्तर कोरिया एक बैरकों में बंद देश बनता गया और देश की पिछड़ती अर्थव्यवस्था ने गरीबी और बेरोजगारी को सम्हालने से हाथ खड़े कर दिए। जोंग-इल ने दमन और मिलिटरी मजबूती का दामन पकड़ा जिसमें घोषित-अघोषित रूप से रूस और चीन का साथ मिलता रहा। जोंग-इल के उत्तराधिकारी किम जोंग-उन ने जब 27 वर्ष की उम्र में बागडोर सम्हाली तो उत्तर कोरिया में एक बदलाव देखा गया, लेकिन जोंग-उन अपने देश के भीतर ही मिसाइलों और परमाण्विक आयुध विकास पर काम करते रहे। इस वक्त तक पुतिन और शी जिनपिंग के निर्बाध नेतृत्व वाले रूस और चीन अपनी बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा स्पष्टतया उजागर करने लगे। चीन, रूस और परमाणु आग्रही उत्तर कोरिया मिलकर एशिया में दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका के द्वारा निर्मित शक्ति संतुलन को चुनौती देने लगे। अमेरिका के नेतृत्व में भारत, जापान, आस्ट्रेलिया को मिलाकर एक अनौपचारिक सामरिक समूह चतुष्क (क्वाड) गढ़ा गया जिससे समूचे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रूस-चीन-उ. कोरिया संगति को संतुलित किया जा सके। भड़काऊ बयानों, मिसाइल परीक्षणों और रूस-चीन-अमेरिका के परस्पर मतभेदों से कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव कुछ कदर बढ़ा कि आये दिन विश्लेषक इस संघर्ष में नवशीत युद्ध की झलक निरखने लगे। मार्च, 2017 में उत्तर कोरिया के जापान की ओर चार बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण के बाद, अमेरिकी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने कहा कि विश्व शांति के विरुद्ध उत्तर कोरिया का भय एक नवीन चरण में प्रवेश कर चुका है। मई 2017 में ट्रम्प ने जोंग-उन को परमाणु हथियारों वाला ‘मैडमैन’ कहा। जून 2017 में अमेरिका ने उ. कोरिया पर प्रतिबन्ध लगाए और जुलाई 2017 में उ. कोरिया ने मिसाइल परीक्षण किया जिसकी जद में संभवतः अमेरिका का अलास्का प्रान्त आता है। सितम्बर, 2017 में संयुक्त राष्ट्र संघ में ट्रम्प ने उ. कोरिया को पूरी तरह तहस-नहस करने की चेतावनी दी और संयुक्त राष्ट्र संघ ने उ. कोरिया पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाया। जवाब में किम जोंग-उन ने भी ट्रम्प को मासिक विक्षिप्त करार देते हुए कहा कि भयभीत स्वान भूँकता अधिक है। 

ट्रम्प अपनी विदेश नीति में जबसे खुलकर कारोबारी रुख अपना रहे हैं तब से उनके सहयोगी अपनी वैदेशिक नीतियों में खासा अनिश्चित हो रहे हैं। ट्रम्प का स्पष्ट मानना है कि यदि अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को अमेरिकी प्रभाव से लाभ है तो वैश्विक जिम्मेदारी मिलकर उठानी होगी। इससे पहले सहयोगी यह मानते रहे कि सुपरपॉवर शक्ति होने के नाते यह महज अमेरिका की जिम्मेदारी है। नवम्बर, 2017 में जब ट्रंप अपने बारह दिवसीय इंडो-पैसिफिक यात्रा में दक्षिण कोरिया पहुंचे तो उन्होने अपना यह रुख स्पष्ट कर दिया था। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जाए-इन, जो कोरियाई मैत्री के नारे से चुनकर सत्ता तक पहुंचे हैं, अपने देश की किसी वैश्विक कूटनीतिक भूमिका के लिए तैयार नहीं थे और उन्होने उ. कोरिया के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों पर काम करना शुरू कर दिया। नतीजा बेहद सकारात्मक रहा क्योंकि उ. कोरिया के नए तानाशाह शासक जोंग-उन अपने देश की चरमराती अर्थव्यवस्था से वाक़िफ़ हैं और दक्षिण कोरिया के मैत्री भाव से उत्तर कोरिया के अस्तित्व को लेकर जो उनकी असुरक्षा है, वह भी जाती रहेगी। मार्च, 2018 में अमेरिका और उ. कोरिया दोनों ने ट्रंप-किम भेंटवार्ता की संभावनाओं की घोषणा कर विश्व को चौंका दिया। 8 मई, 2018 को उ. कोरिया ने तीन अमेरिकी बंदियों को मुक्त किया तो ट्रंप ने मुलाकात की तारीख 12 जून तय कर दी। सहसा, उ. कोरिया ने 15 मई को दक्षिण कोरिया से चल रही अपनी वार्ता, प्रस्तावित अमेरिका-द. कोरिया मिलिट्री अभ्यास की चर्चा करके स्थगित कर दी। ट्रंप ने भी बेहद गुस्से और शत्रु भाव में एक चिट्ठी लिखकर 12 जून की प्रस्तावित भेंटवार्ता स्थगित कर दी। अंततः जब किम जोंग-उन ने पंगये-री के अपने न्यूक्लियर परीक्षण स्थल को खत्म करने की घोषणा की तो 1 जून को ट्रंप ने 12 जून की भेंटवार्ता को बहाल करने की घोषणा की। 

12 जून को ट्रंप और जोंग-उन ने जब सिंगापुर के सेंटोसा में 13 सेकेंड का अपना पहला हैंडशेक किया तो कोरियाई प्रायद्वीप, जापान सहित समूचे विश्व के लिए यह अभूतपूर्व क्षण था। इकहत्तर वर्षीय ट्रंप बेहद उत्साहित दिखे वहीं चौतीस वर्षीय जोंग-उन संयमित बने रहे। ट्रंप ने मुलाकात को बेहद सकारात्मक और उम्मीद से बढ़कर करार दिया वहीं जोंग-उन ने कहा कि यहाँ तक आने के लिए अतीत के फंदों से निकलकर आना पड़ा है। सेंटोसा समझौते में तीन महत्वपूर्ण विकास हुए। पहला, उ. कोरिया ने सतत व स्थायी शांति के लिए पूर्ण कोरियाई परमाण्विक निःशस्त्रीकरण पर अपनी प्रतिबद्धता जतायी। दूसरा, अमेरिका ने इसके बदले उ. कोरिया को सुरक्षा की गारंटी प्रदान की। तीसरा, दोनों पक्षों ने एक नये संबंध की नींव रखने की मंसा प्रकट की। उत्साहित ट्रंप ने जोंग-उन को दक्षिण कोरिया के साथ चलने वाले अमेरिकी मिलिट्री ड्रिल बंद करने का आश्वासन भी दिया, जिसपर द. कोरिया ने चिंता भी व्यक्त कर दी कि सहूलियत बड़ी शीघ्रता से दी जा रही। इस भेंटवार्ता को दोनों नेता अपनी-अपनी उपलब्धि मानकर चल रहे हैं। ट्रंप को मध्यावधि चुनाव में उतरना है और अपने किसी पूर्ववर्ती से अलग उ. कोरिया को सुरक्षा बंदोबस्त देने की बात कहकर वे अपने लिए एक माइलेज तो बना ही रहे हैं, वहीं किम जोंग-उन कुछ वैसा कर गए हैं जैसा कि उनके किसी पूर्ववर्ती तो क्या कोई कोरियाई सपने में भी सोच सकता था। 

यह समझौता विश्व शांति की दृष्टि से यकीनन एक मील का पत्थर है परंतु कुछ आशंकाएं अवश्य ही हैं। समझौते में समयसीमा और शर्तों पर कोई स्पष्टता नहीं है। समझौते के तुरंत बाद जहाँ ईरान ने यह कहकर चुटकी ली कि जोंग-उन को होशियार रहना चाहिए, ट्रंप अमेरिका पहुंचते-पहुंचते समझौता खारिज कर सकते हैं वहीं भारत ने अपनी प्रतिक्रिया में समझौते की मुबारकबाद देते हुए उ. कोरिया के परमाण्विक सूत्र पर दृष्टि रखने की नसीहत दी जो कि भारत के पड़ोस (पाकिस्तान) में है। इस समझौता बैठक के बाद भी चीन और रूस की भूमिका एक मूक दर्शक की तो नहीं ही होगी। गौरतलब है कि किम जोंग-उन अपना पहला विदेशी दौरा मार्च, 2018 में चीन का ही किया था। मई, 2018 में एक बार फिर जोंग-उन, शी जिनपिंग से मिलने चीन गए। चीन और रूस इस समझौते से अमेरिकी खतरा क्षेत्र में कम होने से राहत की साँस ले रहे होंगे लेकिन क्षेत्र में अपनी भूमिका के स्थायित्व को लेकर अवश्य ही सजग होंगे। आने वाले समय में जबकि किम जोंग-उन ने अमेरिका आने का ट्रंप का न्यौता स्वीकार कर लिया है सेंटोसा से शांति का सबक तभी धुंधला नहीं पड़ेगा जब अमेरिका, दक्षिण कोरिया और उ. कोरिया सहयोग और शांति के अधिकाधिक आयाम विकसित करें और जापान, रूस के साथ-साथ चीन भी शांति में ही दूरगामी विकास की संभावना देखे। 

Thursday, May 31, 2018

मोदी डॉक्ट्रिन नहीं पर मोदी प्रभाव




भारतीय लोकतंत्र की विपुल संभावनाएं कुछ ऐसी हैं कि इसमें यह उम्मीद करना कि प्रधानमंत्री एक प्रशिक्षित सामरिक चिंतक हों, ठीक नहीं। इसलिए जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक की विदेश नीति, संस्थागत प्रयासों से अधिक व्यक्तिगत करिश्मे से अधिक संचालित की गयी। आज़ादी के बाद जन्मे नेताओं की पीढ़ी के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में भी यह करिश्मा है और उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल भी किया। विश्व-नेताओं को उनके पहले नाम से संबोधित करना हो या उन्हें गर्मजोशी से गले लगाना हो, मोदी हमेशा विदेश नीति में व्यक्तिगत सिरा खंगालते रहे। अमेरिका, फ़्रांस और जापान के द्विपक्षीय संबंधों में इसका असर भी महसूस किया गया। मोदी सरकार से विदेश नीति को लेकर की जा रही अपेक्षाओं के दो बड़े आधार थे। एक तो कांग्रेस से इतर पहली बार कोई दूसरा दल प्रचंड बहुमत से सत्ता को गले लगा रहा था दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी जैसे नेता शपथ ग्रहण करने जा रहे थे जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अपने दिनों में न केवल कई विदेश यात्राएँ की थीं और व्यापारिक समूहों आदि से संबंध स्थापित किये थे बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के विश्वस्त के रूप में कूटनीतिक संदर्भ में मलेशिया और आस्ट्रेलिया भी भेजे जा चुके थे। नेहरू की तरह ही, प्रधानमंत्री बनने के पूर्व से ही नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में दिलचस्पी खासी व्यक्तिगत रही है। भारत की विदेश नीति को सामयिक, शक्तिशाली और दूरगामी बनाने के ऐतिहासिक अवसर का नरेंद्र मोदी को भान था और किसी तरह की कोई ऐतिहासिक हिचक उनके सामने नहीं थी। 

चुनाव के समय लिए गए अपने कठोर प्रतिक्रियावादी रुख से उभरी आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए शपथ ग्रहण समारोह में सभी पड़ोसी राष्ट्रों के प्रमुखों को आमंत्रित कर नरेंद्र मोदी सरकार ने स्वयं से उम्मीदों के पर लगा दिए। इराक से सफलतापूर्वक बचाई गयीं 46 नर्सों ने आश्वस्त किया कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ टीम मोदी, सशक्त और अपने विज़न में स्पष्ट है। फिर शुरू हुई मोदी की सतत विदेश यात्रा। कुल लगभग 36 विदेश यात्राओं के साथ, प्रधानमंत्री मोदी कोई 56 देशों की ज़मीन पर पाँव रख चुके हैं। इनमें कई देश ऐसे रहे, जहाँ अरसे बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुँचा अथवा मोदी पहली बार पहुँचे। विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए भी यह एक ‘जुड़ाव’ का मौका था और इससे देश को सॉफ्ट पॉवर के रूप में भी स्थापित करने में मदद मिली है । बहुत सारे देशों में द्विपक्षीय वार्ताएं जो ठिठकी पडी थीं, वह पुनः शुरू हुई हैं। 

यह सही है कि अपनी आर्थिक क्षमता, सांस्कृतिक प्रभाव और पिछली सरकारों की वैश्विक सक्रियता से वैश्विक पटल पर भारत की एक अहमियत गढ़ी जा चुकी थी पर मोदी की एक्टिव फॉरेन पॉलिसी ने विश्व को अवश्य यह दिखलाया कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका समझता है। पिछले चार साल, वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद अनिश्चित रहे हैं, कोई खास पैटर्न अकेले इसकी व्याख्या नहीं कर सकता। दुनिया के महत्वपूर्ण देशों यथा- चीन, रूस, जापान, जर्मनी आदि देशों में शक्तिशाली नेतृत्व बना हुआ है और विश्व, द्विपक्षीयता से बहुपक्षीयता के मध्य हिचकोले लेता रहा। रूस ने चीन, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया के साथ अपनी संगति बिठाई तो जापान की पहल पर अमेरिका ने भारत और आस्ट्रेलिया को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ज़िम्मेदारी दी। ट्रम्प का अमेरिका अपनी नीतियों में इतना मोलतोल वाला और चौंकाऊ रहा कि भारत सहित उसके साथी देश अपनी-अपनी विदेश नीति में कोई सुसंगतता स्थापित ही नहीं कर पाए। यूपीए सरकार की तरह ही बढ़ते गैर-पारंपरिक असुरक्षाओं के युग में भी पारंपरिक हथियारों की खरीददारी में मोदी सरकार अव्वल रही और ईयू, फ़्रांस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि से व्यापारिक-सामरिक समझौते भी संपन्न हुए। चाबहार प्रोजेक्ट, आईसीजे में दलवीर भंडारी की जीत, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार समितियों में से एमटीसीआर, डब्ल्यू ए और ऑस्ट्रेलिया समूह सहित तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फाँसी पर रोक, कई देशों से आणविक समझौते करना, एफटीए हस्ताक्षर करना, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन विरुद्ध और मारीशस के पक्ष में मतदान करना, आसियान राष्ट्रप्रमुखों को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित करना आदि यकीनन नरेंद्र मोदी सरकार की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। 

मोदी सबसे अधिक विफल अपने इर्द-गिर्द पड़ोस में हैं। एक भूटान को छोड़कर कहीं और भारत अपने संबंध संजो नहीं पाया है। आक्रामक चीन के सापेक्ष हमारी तैयारी बेहद शिथिल है। नौकरशाही पर नकेल कसने में असफल मोदी की विदेश नीति में न कोई रचनात्मक दृष्टि दिखी न ही तारतम्यता। तारतम्यता के अभाव ने ही मोदी-डॉक्ट्रिन जैसी कोई चीज स्थापित नहीं करने दिया है। सत्ता के आखिरी महीनों में मोदी कुछ उल्लेखनीय बटोरने की हड़बड़ी में दिखते हुए एक बार फिर चीन, रूस आदि से संपर्क साध रहे हैं पर नेहरू बनना उनके लिए कठिन हैँ और पटेल ने कोई नज़ीर छोड़ी नहीं है। 

*लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार व सम्प्रति गलगोटियाज यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष हैं। 

‘आई हेट पॉलिटिक्स': एक पिछड़ा और गैर-जिम्मेदार जुमला





राजनीति' एक अद्भुत शब्द है। यह विषय भी है और व्यवहार भी, प्रक्रिया भी है और कला भी। इतनी घुली-मिली है कि जो इसमें रूचि नहीं लेता यह उसमें भी रूचि लेती है। राजनीति का केवल एक 'सार्वजानिक' पक्ष ही हमें दिखलाई पड़ता है और इस पक्ष के जो खिलाड़ी हैं उनके चरित्र से ही समूचे राजनीति का हम चरित्र-चित्रण कर देते हैं। राजनीति का यह 'सार्वजानिक पक्ष' भी हमें इतना प्रभावी रूप से दृष्टिगोचर इसलिए होता है क्योंकि हमनें 'लोकतांत्रिक' शासन प्रणाली अपनाई है और इसकी कई संक्रियाओं में हमें स्वयं को परिभाग करने का अवसर मिलता है। किन्तु 'राजनीति' को केवल उसके इस सार्वजानिक पक्ष से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उससे पहले यह इस सार्वजानिक पक्ष का दर्शन तैयार करती है, इस प्रश्न का उत्तर तैयार करती है कि आखिर हमें कोई व्यवस्था क्यों चाहिए और अंततः यह व्यवस्था हम कैसे आत्मसात करने जा रहे हैं! यह सभी महत्वपूर्ण बिंदु हैं।

विषय के रूप में 'राजनीति' पल-पल बदलते व्यक्ति के बहुमुखी विकास की चिंता करती है। व्यवहार के रूप में 'राजनीति' उन प्रक्रियाओं की तमीज देती है, जिनसे 'अधिकतम का वृहत्तम हित' सधे। कला के रूप में 'राजनीति' विरोधाभासी हितों में संतुलन की प्रेरणा देती है। चूँकि लोकतंत्र सभी को राजनीति में परिभाग करने की स्वतंत्रता देती है तो 'राजनीतिक अध्ययन' से अधिक 'राजनीतिक व्यवहार' की महत्ता दिखने लगती है। गाड़ी चलाने वाला हर ड्राइवर न ट्रैफिक नियम जानता है और न ही वह निश्चितरूप से ट्रैफिक की गलतियाँ ही करता है। प्राकृतिक विज्ञानों के अलावा ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों में 'अनुभवजन्य बोध' भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने कि सैद्धांतिक बोध क्योंकि यहाँ ऑब्जेक्ट डायनामिक ह्यूमन बींग है। इसलिए अच्छा ड्राइवर होना और एक अच्छा मोटर इंजीनियर होने में फर्क है और ‘पोलिटिकल लिटरेसी’ समय की मांग है। 

राजनीति के लोकतांत्रिक हस्तक्षेप ने मिस्त्री लोगों को भी पर्याप्त अवसर दिया है और वे हर बार निराश ही नहीं कर रहे हैं। समझना होगा ये हम हैं कि अपने लोकतंत्र के लिए 'इंजीनियर' के ऊपर 'मिस्त्री' प्रेफर कर रहे हैं। अरस्तु ने राजनीति को 'विषयों का विषय' कहा है और प्लेटो ने राजनीति में सबके आवाजाही की मनाही की है। प्लेटो राजा भी दार्शनिक चाहते हैं। इसलिए ही अरस्तु ने 'लोकतंत्र' को भीड़तंत्र कहा है क्योंकि इसमें योग्यता से अधिक संख्या का महत्त्व हो जाता है।

लोकतंत्र फिर क्यों? क्योंकि औद्योगीकरण के पश्चात् ज्यों-ज्यों पूंजी की हवस बढ़ी, उपनिवेशवाद आया जिसने व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलना शुरू किया। उपनिवेश ज्यों-ज्यों स्वतंत्र होते गए उन्होंने सबसे पहले अपने नागरिकों वह देना चाहा, जिससे वह वंचित थे, वह था व्यक्ति का व्यक्तित्व-स्वतंत्रता। केवल लोकतंत्र में ही समानता संभव है और उपनिवेशवाद ने समूचे उपनिवेश के प्रत्येक व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व छीना था इसलिए आधुनिक समय में 'लोकतंत्र' एक 'व्यवस्था' से अधिक एक उदात्त 'मूल्य' बनकर उभरा।

भारत का एक औपनिवेशिक अतीत है और इतिहास कहता है कि भारत की जनसँख्या में भांति-भांति के लोगों का सुंदर सम्मिश्रण है। आजाद भारत लोकतंत्र के अलावे कोई और व्यवस्था अपना ही नहीं सकता था क्योंकि यहाँ के लोगों में विभिन्नता है और केवल लोकतंत्र उनमें 'समानता' और 'स्वतंत्रता' का विश्वास उपजा सकता था। यह विश्वास उस सद्यजात राष्ट्र को आवश्यक भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता प्रदान करता है जिसने तुरंत ही विभाजन का दंश झेला हो और जिसकी 500 से अधिक रियासतों का एकीकरण किया जाना हो। भारत के लोकतंत्र में सभी आवाजों के लिए जगह होनी चाहिए, सो सभी चुनाव लड़ सकते हैं। निर्दलीय भी। 17% साक्षरता वाले राष्ट्र को आधुनिक राजनीतिक-समाजीकरण की प्रक्रिया से साक्षात्कार कराना जरूरी थी पर यह राज्य की तरफ से न हो नहीं तो निष्पक्ष नहीं होगा और इसके बिना व्यवस्था के ढहने का भी डर था। फिर जनता के विभिन्न मांगों को पूरा करने का कोई एक तरीका ही थोपना आगे चलकर खतरनाक हो सकता था। इसलिए राजनीतिक दलों की प्रणाली लाई गयी। भारत की महान विभिन्नता देखते हुए द्विदलीय व्यवस्था को नहीं स्वीकारा गया। बहुदलीय व्यवस्था में चेक एंड बैलेंस प्रणाली भी चल सकती है। बहुमत दल का नेता सरकार बनाये अथवा मिनिमम कॉमन प्रोग्राम के हिसाब से गठबंधन की सरकार बने और शेष सांसद उनपर पैनी नज़र रखें।

विपक्ष उतना ही जरूरी है जितना की सत्ता पक्ष। दलविहीन व्यवस्था अथवा सर्वदलीय व्यवस्था में विपक्ष अनुपस्थित होगा अथवा अंतर्निहित होगा तो कमजोर होगा, जो कि एक खतरनाक स्थिति होगी। पॉँच साल तक किसी भी तरह का सार्वजानिक नियंत्रण ही नहीं होगा। लोकतंत्र की चिंता येनकेनप्रकारेण केवल सरकार बनवा देना नहीं है, बल्कि राजनीतिक मूल्यों का संवहन करते हुए राजनीतिक विकास की गुंजायश टटोलना है। एक नया चुनाव हमेशा एक सस्ता विकल्प है बनिस्बत एक भ्रष्ट स्थिर सरकार के, जिनके घोटाले ही न पकडे जा सकें और जो पकड़ें जा सकें तो कभी उनका निपटारा ही न हो सके। गठबंधन की सरकार भारत की विभिन्नता देखते हुए स्वाभाविक है और उनकी खींचातान भी जायज है क्योंकि विरोधाभासी मांगों का संतुलन यों भी कठिन है। राजनीतिक व्यवस्था अपने संविधान के अनुरूप इतनी खूबसूरत है कि बहुमत के साथ वही दल सत्ता में आ सकता है जिसके प्रतिनिधियों में विभिन्नता से प्रतिनिधित्व बंटा हो। ऐसा नहीं होता तो गठबंधन से यह शर्त पूरी होती है।

ध्यान रहे, हमारे राष्ट्र के दो अमूर्त आधार हैं: १. एकता और २. विभिन्नता। इसलिए ही यहाँ राष्ट्रपति है तो प्रधानमंत्री भी है, मुख्यमंत्री भी है और राज्यपाल भी। किसी भी दूसरे विकसित राष्ट्र से अपने राष्ट्र की सीधी तूलना नहीं हो सकती। कांग्रेस जो कभी अपराजेय थी और भाजपा जो अभी अपराजेय लगती है, राज्यसभा में उन्हें अवश्य नियंत्रण में रहना पड़ता है। हमारा संविधान बेहद शानदार है। पर परेशानी यही हैं। हम, अपना संविधान जानते कितना हैं? 

सत्ता, ऐसी शिक्षा बनाती है जिससे पीढियाँ 'राजनीतिक अध्ययन' का महत्त्व विस्मृत कर जाती हैं। इससे राज करना आसान हो जाता है क्योंकि राजनीतिक रूप से जागरूक जनता तीखे सवाल करेगी और मीडिया का निष्पक्ष न रहना उसे तुरंत दिखेगा। सत्ता, राजनीतिक-अध्ययन से मिलने वाले रोजगार पर चोट करेगी जिससे राजनीति पढ़ने वाले साधनविहीन आदर्शवादी लगेंगे। ध्यान से देखिये, सरकार चाहेगी कि सारे महत्वपूर्ण पद जहाँ इलेक्शन नहीं सिलेक्शन की जरुरत होती है, उन्हें 'कमिटेड ब्यूरोक्रेसी' से भरा जाय, जिससे शासन आसान हो। यह माहौल बनेगा जब जनता 'कोउ नृप होय, हमें का हानि' की मानसिकता में आये और हम जनता-जनार्दन अपने-अपने घरों की जो नयी पीढ़ी है उसका सबसे बेहतर टैलेंट-पूल नौकर (ब्यूरोक्रेसी अथवा डॉक्टर, इंजीनियर ) बनाने में करते हैं और लोकतंत्र में जहाँ बॉस जनता होती है उसे अपने घर का हारा-थका, लापरवाह सेक्शन मायूसी से सौंपते हैं कि कुछ नहीं तो सरकारी ठेकेदार तो बनी जायेगा । वोट नहीं देने जाते, आसानी से वोटबैंक बन जाते हैं।

राज्य और नागरिक समाज साथ-साथ ही स्वास्थ्य के साथ पनपते हैं। इनमें से एक की अक्रियता दूसरे को रुग्ण बनाती है। नागरिक समाज, राज्य के सरकार नामक तत्व पर नियंत्रण रखती है। किन्तु भ्रष्ट सरकारें और दिशाहीन अक्रिय नागरिक-समाज 'राजनीतिक-शिक्षा (पोलिटिकल लिटरेसी) के प्रचार-प्रसार में उसी तरह चुप्पी साध लेती हैं जैसे भ्रष्ट दुकानदार दवा की एक्सपायरी डेट छुपाता है। हमें अपने-अपने स्तर पर अध्ययन-मनन और व्यवहार की पद्धति से राजनीतिक जागरूकता बढ़ानी होगी।

संविधान का ड्राफ्ट तैयार होने के बाद बाबा आंबेडकर ने कहा था कि-वह नागरिक ही होते हैं, जो किसी देश के संविधान को सफल बनाते हैं। देखिये न, अमेरिका का संविधान कितना तो छोटा है और संसद की जननी ब्रिटेन में लिखित संविधान ही नहीं है। हमारे पास दुनिया के सबसे बड़े संविधानों में से एक संविधान है बस हम राजनीति में अपने-अपने रीति से योग ही नहीं कर रहे। जो चाहते हैं कि चुनाव के बाद आपको सचमुच फायदा हो तो आप प्रधानमंत्री नहीं, अपने-अपने क्षेत्र से सुयोग्य सांसद चुनिए. और हाँ, ये न कहिए कि विकल्‍प नहीं है. आपके क्षेत्र में जरूर एक संकल्पवान, ईमानदार प्रत्याशी खड़ा मिलेगा, पर शायद उसके साथ कोई खड़ा न मिले. आप अपना एक बहुमूल्य मत उसे दें, कम से कम बाकियों की तरह अपना मत व्यर्थ न होने दें. वह हारेगा भी तो संघर्ष करने का माद्दा मन में भरेगा और अगली बार फिर मैदान में होगा.

अपने-अपने क्षेत्र में आप विकल्‍प चुनिए, भारतीय राजनीति, राष्ट्रीय परिदृश्य में सहसा नए विकल्‍प उपस्थित कर देगी. यह नया विकल्‍प अपने साथ किसी उद्योगपति का बकाया नहीं लेकर आएगा, जात-पात, धरम और सेना का नाम लेकर नहीं आएगा तो खुलकर काम करेगा. आप अचानक राजनीति में परिवर्तन भर देंगे और आप तब केवल नागरिक कहलाने की सच्ची परिभाषा ही नहीं पूरी करेंगे बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान-निर्माताओं के सपनों का भारत बनाने की दिशा में काम करने वाले सच्चे देशभक्त बनेंगे. तब राजनीति आपके लिए कोई खेल या मनोरंजन अथवा गॉसिप की चीज नहीं होगी, बल्कि इसमें आप सीधा योग करेंगे. क्योंकि, फिर कहता हूँ कि भाजपा, कांग्रेस में कोई अंतर है नहीं. एक के मुकदमे की सुनवाई की अगली तारीख दूसरा ले लेता है.

मैंने जो कहा है वह आपको यूटोपियन लग सकता है, इसलिए नहीं कि मै गलत कह रहा, बल्कि इसलिए कि पहले तो आप मत देने जाएंगे ही नहीं और जो जाएंगे भी तो अपना मत किसी परिचित, जात वाले, धरम वाले को देकर आ जाएंगे. फिर जो आपको अपना वोटबैंक समझते हैं, उन्हें ही वोट देकर आप सोचेंगे कि मेरा वोट व्यर्थ नहीं गया, जबकि आपका मत केवल व्यर्थ ही नहीं होता इससे, बल्कि अगले पांच साल का भविष्य दाँव पर लग जाता है और अगली पीढ़ी भी आपकी तरह 'आई हेट पॉलिटिक्स' का पिछड़ा, गैर-जिम्मेदार जुमला कहने लग जाती है.



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